← सभी लेख देखें

बिना मारे अनुशासन: टैंट्रम, ज़िद और अपने गुस्से को संभालने के असली तरीके

परवरिश और व्यवहार · theAsianparent · अपडेट किया गया

फेंकी हुई थाली, उठा हुआ हाथ और उसके बाद की शर्मिंदगी — उम्र के हिसाब से काम करने वाले तरीके, वे वाक्य जो आप उसी वक्त बोल सकते हैं, और घर के लिए एक तैयार नियम-चार्ट।

फेंकी हुई थाली, और वह हाथ जो उठ गया

रात के साढ़े आठ बजे हैं। चार साल के अर्जुन ने तीसरी बार कहा कि उसे यह सब्ज़ी नहीं खानी, और चौथी बार पर थाली एक झटके में फर्श पर है। दाल दीवार तक पहुंची है, कमरे में दादी की आवाज़ आती है 'बिगाड़ रखा है इसे', और मां का हाथ उठ जाता है। एक थप्पड़। फिर सन्नाटा, फिर अर्जुन का रोना, और फिर वह चीज़ जो सबसे लंबी टिकती है — मां के पेट में गिरता हुआ पछतावा।

यह दृश्य किसी 'बुरी मां' का नहीं है। यह उस मां का है जो सुबह 6 बजे से खड़ी है, जिसने चार बार समझाया, जिसके पास इस वक्त कोई और औज़ार नहीं बचा था। हाथ उठना अक्सर बच्चे के व्यवहार से नहीं, माता-पिता के खत्म हो चुके धैर्य से निकलता है — और यही असली जगह है जहां काम शुरू करना होता है।

अनुशासन का मतलब सज़ा नहीं, सिखाना है। लक्ष्य ऐसा बच्चा नहीं जो डर से चुप हो जाए, बल्कि ऐसा बच्चा है जो सही चुनाव तब भी करे जब कोई देख न रहा हो। नीचे वही तरीके हैं जो उम्र के हिसाब से काम करते हैं, वे वाक्य जो उसी पल में मुंह से निकल सकें, और सबसे ज़रूरी हिस्सा — अपने गुस्से को 30 सेकंड में संभालने का तरीका।

मार काम क्यों नहीं करती — और तुरंत काम करती क्यों लगती है

शोध का ढेर एक ही दिशा में इशारा करता है: शारीरिक सज़ा से बच्चा वह काम करना नहीं छोड़ता, बस पकड़े जाने से बचना सीखता है। नतीजे में तीन चीज़ें बढ़ती हैं — झूठ बोलना, आक्रामक व्यवहार, और यह सीख कि गुस्सा हाथ उठाकर निकाला जाता है। जिन घरों में मार आम है, वहां किशोर उम्र में माता-पिता से बात छिपाने की आदत भी ज़्यादा दिखती है, यानी ठीक उस उम्र में संवाद टूटता है जब वह सबसे ज़रूरी होता है।

फिर भरोसा क्यों बन जाता है कि 'मार काम करती है'? क्योंकि असर तुरंत दिखता है — बच्चा उसी सेकंड चुप हो जाता है। पर वह चुप्पी सीख नहीं, डर है। दो घंटे बाद वही व्यवहार लौट आता है, और अगली बार थप्पड़ थोड़ा ज़ोर से लगाना पड़ता है। यही वजह है कि मार पर टिका अनुशासन समय के साथ आसान नहीं, और मुश्किल होता जाता है।

संयुक्त परिवारों में एक वाक्य लगभग हर घर में सुनाई देता है: 'हमें भी तो मार पड़ी थी, हम कहां बिगड़े?' इसका सम्मान से जवाब दिया जा सकता है — 'आपने बहुत कुछ सही किया, इसीलिए हम यहां हैं। पर मार वाला हिस्सा हमें डराता था, और मैं नहीं चाहती कि मेरा बच्चा मुझसे डरे।' बहस जीतने की कोशिश मत कीजिए; बस अपने बच्चे के लिए नियम खुद तय कीजिए और उस पर टिके रहिए।

1-4 साल: टैंट्रम के बीच क्या करें, क्या कहें

इस उम्र का ज़्यादातर 'बुरा व्यवहार' दरअसल विकास है। दो साल का बच्चा भावना के तूफान को शब्द नहीं दे पाता, इसलिए वह ज़मीन पर लोटता है। ध्यान टिकने का मोटा हिसाब भी याद रखिए — उम्र के हर साल पर लगभग 2 से 4 मिनट, यानी तीन साल के बच्चे से 8-10 मिनट से ज़्यादा शांत बैठने की उम्मीद रखना खुद को हराना है। सबसे असरदार तीन औज़ार यहां हैं: ध्यान हटाना, विकल्प देना ('लाल शर्ट या नीली?' — दोनों में आपकी जीत है), और खतरे या झगड़े की चीज़ें पहले से पहुंच से हटा देना।

टैंट्रम के बीच लंबा भाषण बेकार है — उस वक्त दिमाग का सुनने वाला हिस्सा लगभग बंद रहता है। पास बैठिए, सुरक्षित रखिए और छोटे वाक्य बोलिए: 'तुम्हें बहुत गुस्सा आ रहा है, मुझे समझ आ रहा है।' … 'तुम्हें वह चॉकलेट चाहिए थी। आज नहीं मिलेगी।' … 'मैं यहीं हूं। जब चाहो, गले लग जाना।' तूफान उतरने के बाद ही सिखाइए, और छोटे शब्दों में: 'गुस्सा आना ठीक है। थाली फेंकना ठीक नहीं। गुस्सा आए तो मुझे बताना या तकिया दबा लेना।'

बाज़ार या शादी में टैंट्रम हो तो लोगों की नज़रों को नहीं, बच्चे को संभालिए — उसे उठाकर भीड़ से बाहर, गाड़ी या किसी शांत कोने में ले जाइए, और वहीं शांत होने दीजिए। और सबसे ज़रूरी: 'चुप हो जा' के बदले चॉकलेट या फोन देना उसी पल राहत देता है, पर अगले हफ्ते टैंट्रम की संख्या बढ़ा देता है, क्योंकि बच्चा सीख जाता है कि यही तरीका काम करता है।

5 साल से बड़े बच्चे: नतीजे, निरंतरता और जुड़ाव

नियम कम रखिए — पांच-छह से ज़्यादा नहीं — पर पत्थर की लकीर की तरह। जो आज मना है वह कल भी मना हो, मां के सामने भी और दादी के सामने भी, और पापा के लौटने पर बदल न जाए। संयुक्त परिवार में यह सबसे बड़ी चुनौती है, इसलिए हफ्ते में एक बार बड़ों के साथ दो मिनट की बात कर लीजिए: 'रात 9 बजे टीवी बंद और खाना मेज़ पर — बस इन दो बातों पर सब एक जैसा बोलें, बाकी में आपकी मर्ज़ी।'

सज़ा की जगह 'जुड़े हुए नतीजे' रखिए — यानी वह नतीजा जो गलती से सीधा जुड़ा हो और पहले से बताया गया हो। खिलौने नहीं समेटे तो कल वह खिलौना अलमारी में; दीवार पर लिखा तो साथ में मिलकर साफ करना; साइकिल गली से बाहर ले गए तो दो दिन साइकिल नहीं। और नतीजा तय करने से पहले बताइए, गुस्से में मत गढ़िए — 'आज खाना नहीं मिलेगा' या 'महीने भर बाहर नहीं जाओगे' जैसे बड़े ऐलान अक्सर आप ही तोड़ते हैं, और तब नियम की कीमत गिर जाती है।

बुरे व्यवहार को पकड़ने से ज़्यादा ताकतवर है अच्छे व्यवहार को पकड़ना। 'तुमने भाई को खुद खिलौना दिया, यह बहुत बड़ी बात है' जैसे ठोस वाक्य उस व्यवहार को दोहराते हैं। इसी तरह तुलना — 'देखो, दीदी कितनी सीधी है' — व्यवहार नहीं सुधारती, सिर्फ भाई-बहन के बीच दूरी और अपने बारे में हीन भाव पैदा करती है।

घर का नियम-चार्ट, 15 मिनट का जुड़ाव और आपका अपना गुस्सा

फ्रिज पर चिपकाने लायक एक नमूना चार्ट: (1) किसी को मारना नहीं — न बच्चों को, न बड़ों को, घर में किसी को नहीं; नतीजा: खेल रुकेगा, शांत होकर दूसरे से बात। (2) खाना मेज़ पर, स्क्रीन बंद; नतीजा: फोन खाने के बाद ही। (3) होमवर्क खेल से पहले; नतीजा: देर हुई तो खेल का समय उतना कम। (4) खिलौने-किताबें सोने से पहले जगह पर; नतीजा: बिखरा सामान अगले दिन के लिए अलमारी में। (5) रात 9 बजे सारे स्क्रीन बंद। पांच से ज़्यादा नियम याद नहीं रहते — न बच्चों को, न आपको।

इस चार्ट को चलाने वाला असली ईंधन नियम नहीं, रिश्ता है। रोज़ 15 मिनट सिर्फ बच्चे के साथ रखिए — बिना फोन, बिना निर्देश, बिना 'होमवर्क हुआ?' — जिसमें खेल वह चुने। जिन घरों में यह 15 मिनट पक्के होते हैं, वहां दिन भर ध्यान खींचने के लिए की जाने वाली शरारतें अपने आप घटती हैं, क्योंकि बच्चे को ध्यान पहले ही मिल चुका होता है।

और अब सबसे ज़रूरी हिस्सा — आपका अपना गुस्सा। हाथ उठने जैसा लगे तो 30 सेकंड का नियम चलाइए: बच्चे को सुरक्षित जगह पर छोड़कर कमरे से बाहर जाइए, नल के नीचे हाथ रखिए या पांच गहरी सांसें लीजिए, और मन में कहिए 'यह बच्चा मुझे परेशान नहीं कर रहा, यह परेशान है।' यह हार नहीं, समझदारी है। अगर हाथ उठ ही गया हो, तो मरम्मत का रास्ता खुला है — बाद में बच्चे की आंखों में देखकर कहिए: 'मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आया और मैंने तुम्हें मारा। मारना गलत है, मुझे भी नहीं करना चाहिए था। मुझे माफ करना।' माफी आपको कमज़ोर नहीं बनाती — यह गुस्सा संभालने की सबसे बड़ी क्लास है जो आपका बच्चा कभी देखेगा।

दादी-नानी कहती हैं vs आज का विज्ञान

'मार खाकर ही सुधरते हैं बच्चे' — यह सबसे पुरानी और सबसे नुकसानदेह मान्यता है। सुधार का जो हिस्सा दिखता है, वह डर है; और डर सिर्फ उस व्यक्ति के सामने काम करता है जो मारता है। इसीलिए मार वाले घरों के बच्चे अक्सर पापा के सामने सीधे और मां के सामने बेकाबू, या स्कूल में शांत और घर में आक्रामक दिखते हैं।

'तुलना से बच्चा सुधरता है' और 'शर्म दिलाओगे तो अकल आएगी' — दोनों उलटे पड़ते हैं। रिश्तेदारों के सामने 'यह तो कुछ नहीं करता' कहना बच्चे में सुधार की नहीं, अपने बारे में एक स्थायी राय की नींव डालता है। इसी तरह 'डर ज़रूरी है, थोड़ा डर तो होना चाहिए' की जगह असल में जो चाहिए वह है भरोसा — बच्चा गलती करने के बाद आपके पास आ सके, यही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

बड़ों की बहुत सी बातें आज के विज्ञान से पूरी तरह मेल खाती हैं, और उनका खुले मन से इस्तेमाल कीजिए: रोज़ का तय रूटीन (जिससे झगड़े आधे हो जाते हैं), रात को कहानी सुनाना, दादा-दादी का लंबा धैर्य, बच्चों को घर के काम में शामिल करना, और वह पुराना तरीका जिसमें गुस्सा उतारने के लिए बच्चे को बाहर खेलने भेज दिया जाता था। मतभेद सिर्फ एक बात पर रखिए, और वह साफ रखिए: इस घर में हाथ नहीं उठेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: बच्चा सिर्फ डांटने पर ही सुनता है, प्यार से कहने पर टालता है — तब क्या करें? — अक्सर वजह यह होती है कि निर्देश दूर से, दो कमरों के बीच से दिया जाता है। पास जाइए, आंखों के स्तर पर आइए, कंधे पर हाथ रखिए और एक काम, एक वाक्य में कहिए: 'अब जूते अलमारी में।' साथ ही सवाल की शक्ल में निर्देश मत दीजिए — 'चलोगे?' का जवाब 'नहीं' आना ही है।

सवाल: दादी-दादा बच्चे को मारते हैं या सामने ही डांटते हैं, मैं क्या करूं? — बहस बच्चे के सामने नहीं, बाद में अकेले में कीजिए, और मुद्दा तर्क का नहीं, अनुरोध का रखिए: 'मुझे पता है आप उसका भला चाहते हैं। मारने वाली बात पर मैं बहुत परेशान हो जाती हूं — कुछ भी हो तो मुझे बता दीजिए, मैं संभाल लूंगी।' उसी वक्त बच्चे को शांति से वहां से हटा लेना पूरी तरह सही है।

सवाल: टाइम-आउट सही तरीका है या नहीं? — 3 साल से बड़े बच्चों के लिए इसे 'सज़ा वाला कोना' नहीं, 'शांत होने की जगह' बनाइए — उम्र के हर साल पर लगभग एक मिनट, और वह जगह अंधेरा कमरा या बाथरूम कभी नहीं। बेहतर यह है कि आप साथ बैठें और शांत होने तक रुकें; अकेले भेजे जाने से छोटे बच्चे अक्सर और घबरा जाते हैं।

सवाल: मैं हर हफ्ते हाथ उठा देती हूं और बाद में बहुत बुरा लगता है — क्या यह बदल सकता है? — हां, पर अकेले धैर्य से नहीं। उन तीन समयों को पहचानिए जब यह सबसे ज़्यादा होता है (आमतौर पर सुबह स्कूल की भागदौड़, शाम का होमवर्क और रात का खाना) और उन तीन जगहों पर ढांचा बदलिए — 15 मिनट पहले उठना, होमवर्क को 20 मिनट के टुकड़ों में बांटना, खाना जल्दी करना। साथ ही अपनी नींद और मदद का इंतज़ाम भी उतना ही ज़रूरी है; लगातार गुस्सा और रोना-सा मन रहे तो डॉक्टर से बात करना कमज़ोरी नहीं है।

अनुशासनपॉज़िटिव पेरेंटिंगज़िदटैंट्रमव्यवहार
अपने पसंदीदा ब्रांड को वोट करें →