रात के चार बजे एक हाथ से चलने लायक़ रिकॉर्ड: बायीं-दायीं-बोतल के तीन बटन, गीले-पॉटी के दो. जवाब पहली पंक्ति में — आख़िरी दूध कब, अगली बार कौन सी तरफ़.
दूध शुरू करते समय उस तरफ़ का बटन दबाएँ — बायीं, दायीं या बोतल. डायपर बदलते समय गीला या पॉटी. बस इतना ही.
सारे रिकॉर्ड आपके ही फ़ोन में रहते हैं — हमें नहीं भेजे जाते. स्तन पर कितने मिनट रहा, इससे यह तय नहीं होता कि बच्चे को काफ़ी दूध मिला या नहीं; कुछ बच्चे झटपट पीते हैं. गीले डायपरों की गिनती और डॉक्टर के यहाँ होने वाला वज़न — यही असली पैमाने हैं.
नींद टूटे दिमाग़ में पहले हफ़्तों के दो ही सवाल होते हैं: आख़िरी बार दूध कब पिलाया था, और अगली बार कौन सी तरफ़ से शुरू करना है. यह साधन दोनों के जवाब पहली पंक्ति में रखता है — किसी चार्ट के नीचे दबाकर नहीं.
तरफ़ बदल-बदलकर पिलाना इसलिए मायने रखता है कि दोनों तरफ़ दूध बनना बराबर चले और एक तरफ़ भारीपन या गाँठ न बने. याद रखने की ज़रूरत नहीं — साधन ख़ुद बताता है कि पिछली बार किस तरफ़ से था.
और 24 घंटे की गिनती नीचे रहती है. नवजात आमतौर पर चौबीस घंटे में आठ से बारह बार दूध पीता है — यानी हर दो से तीन घंटे में. इससे ज़्यादा बार माँगना भी सामान्य है, ख़ासकर शाम को और बढ़त के दौर (ग्रोथ स्पर्ट) में.
स्तन पर कितने मिनट रहा, इससे यह तय नहीं होता कि बच्चे को काफ़ी दूध मिला — कुछ बच्चे दस मिनट में पेट भर लेते हैं, कुछ चालीस लगाते हैं. मिनटों की गिनती सिर्फ़ चिंता बढ़ाती है.
असली पैमाना डायपर है. जन्म के पाँचवें दिन से दिन में छह या ज़्यादा अच्छे गीले डायपर हों, तो दूध पर्याप्त है — यही वह निशानी है जो अस्पताल से घर तक साथ चलती है. पॉटी का रंग-ढंग पहले हफ़्तों में बदलता रहता है और वह भी सामान्य है.
दूसरा पैमाना वज़न है, और वह डॉक्टर के यहाँ नपता है. जन्म के बाद थोड़ा घटना सामान्य है; दो हफ़्तों में जन्म का वज़न वापस आ जाना चाहिए. ये दो पैमाने — डायपर और वज़न — मिलकर 'दूध काफ़ी है या नहीं' का जवाब देते हैं.
आज गीले डायपर छह से कम हों या पेशाब गहरा पीला हो, तो साधन ऊपर चेतावनी दिखाता है. उसका मतलब एक ही है: बच्चे को आज ही डॉक्टर को दिखाएँ.
जो नहीं करना है, वह ज़्यादा ज़रूरी है: अपने मन से फ़ॉर्मूला शुरू मत कीजिए. 'दूध कम पड़ रहा है' का डर ज़्यादातर बार ग़लत निकलता है, और बिना ज़रूरत फ़ॉर्मूला जोड़ने से स्तन को माँग कम मिलती है — जिससे दूध सचमुच कम बनने लगता है. यह उल्टा चक्कर बहुत घरों में चला है.
छह महीने तक बच्चे को सिर्फ़ माँ का दूध चाहिए — पानी, घुट्टी, शहद, जानवर का दूध कुछ नहीं. गर्मी के दिनों में भी नहीं: माँ के दूध का बड़ा हिस्सा पानी ही है. घर में यह बात पहले से साफ़ कर लें, क्योंकि घुट्टी-शहद की सलाहें प्रसव के बाद ही आती हैं.
पाँचवें दिन के बाद दिन में छह से कम गीले डायपर, या गहरा पीला पेशाब. बच्चा इतना उनींदा कि दूध न पी सके, या हर बार जगाकर पिलाना पड़े.
जन्म का वज़न दो हफ़्तों में वापस न आए, या वज़न घटता जाए. पीलिया बढ़ता दिखे — ख़ासकर हाथ-पैरों तक पीलापन पहुँचे. मुँह सूखा हो और सिर के ऊपर की मुलायम जगह धँसी हुई लगे.
इनमें से कुछ भी हो तो अगली नियमित जाँच का इंतज़ार न करें — उसी दिन दिखाएँ. सरकारी अस्पताल, PHC और आँगनवाड़ी की ASHA दीदी — जो भी पास हो. यह रिकॉर्ड साथ ले जाएँ; 'कितनी बार पिलाया, कितने डायपर' का लिखा जवाब डॉक्टर का पहला सवाल बचा देता है.
सवाल: बच्चा हर घंटे दूध माँग रहा है — दूध कम है क्या? — ज़रूरी नहीं. शाम की 'क्लस्टर फ़ीडिंग' और बढ़त के दौर में बार-बार माँगना सामान्य है. डायपर और वज़न ठीक हों, तो दूध काफ़ी है — माँग बढ़ाकर बच्चा अगले दिनों का दूध 'ऑर्डर' कर रहा है.
सवाल: एक तरफ़ से पिलाऊँ या दोनों? — पहले एक तरफ़ पूरा होने दें — पीछे का गाढ़ा दूध वहीं मिलता है — फिर दूसरी पेश करें. बच्चा न ले तो अगली बार उसी तरफ़ से शुरू करें. साधन यही याद रखता है.
सवाल: बोतल का बटन क्यों है? — निकाला हुआ दूध या डॉक्टर की सलाह का फ़ॉर्मूला बोतल से भी जाता है, और गिनती में हर दूध गिनना चाहिए. बोतल का बटन होना फ़ॉर्मूला की सलाह नहीं है.
सवाल: रिकॉर्ड कहाँ जाता है? — कहीं नहीं. सब आपके फ़ोन के ब्राउज़र में रहता है, हमें कुछ नहीं भेजा जाता. पेज बंद करने पर भी मिटता नहीं.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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