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नवजात शिशु की देखभाल: पहले 30 दिन की पूरी गाइड

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नवजात शिशु की देखभाल: पहले 30 दिन की पूरी गाइड

गीले डायपर की गिनती से लेकर नाभि, नींद, टीके और उन संकेतों तक जिन पर उसी दिन डॉक्टर के पास जाना है — पहले महीने की हर बात, नंबरों के साथ।

घर आने की पहली रात

अस्पताल से घर आने की पहली रात लगभग हर घर में एक जैसी होती है। रात के ढाई बजे हैं, बच्चा आधे घंटे से रो रहा है, सास कह रही हैं थोड़ी घुट्टी दे दो, ननद कह रही हैं ऊपर का दूध पिला दो, और मां को समझ नहीं आ रहा कि भूख है, गैस है या कुछ और। अस्पताल में नर्स थीं, यहां सिर्फ आप हैं — इससे निकलने का रास्ता तीन-चार साफ नंबर याद रखना है।

नवजात दिन में 8 से 12 बार दूध पीता है, यानी हर 2 से 3 घंटे में, रात में भी। जन्म के 5-6 दिन बाद से रोज़ कम से कम 6 गीले डायपर और 3-4 बार सुनहरी-पीली पॉटी होनी चाहिए — यही सबसे भरोसेमंद सबूत है कि दूध पर्याप्त मिल रहा है। पहले हफ्ते में वज़न 7 से 10 प्रतिशत घटना सामान्य है, 10-14 दिन में जन्म का वज़न वापस आना चाहिए और उसके बाद रोज़ करीब 25-30 ग्राम बढ़ना चाहिए।

पहला पीला गाढ़ा दूध यानी कोलोस्ट्रम फेंकना नहीं है — यह शिशु का पहला टीका है और उसमें रोगों से लड़ने वाले तत्व सबसे ज़्यादा होते हैं। छह महीने तक सिर्फ मां का दूध काफी है: न पानी, न शहद, न घुट्टी, न ऊपर का दूध। एक साल से पहले शहद बिल्कुल नहीं — इससे बोटुलिज़्म नाम की गंभीर बीमारी हो सकती है।

नाभि, त्वचा और नहलाना

नाभि का ठूंठ आम तौर पर 5 से 15 दिन में सूखकर अपने आप गिर जाता है। उस पर कुछ भी नहीं लगाना — न तेल, न हल्दी, न राख, न सिक्का, न पट्टी। बस सूखा और खुला रखें और डायपर को नाभि के नीचे मोड़ें; गीला हो जाए तो साफ रुई से थपथपाकर सुखाएं। आसपास लाली फैलना, बदबू, मवाद या खून बहते रहना दिखे तो उसी दिन डॉक्टर को दिखाएं — यह संक्रमण नवजात में तेज़ी से फैलता है।

ठूंठ गिरने तक स्पंज बाथ ही काफी है: गुनगुने पानी में भिगोया मुलायम कपड़ा, चेहरा, गर्दन की सिलवटें, बगल और डायपर वाला हिस्सा। कमरा 26-28 डिग्री गर्म हो, पंखा बंद, और पानी 37-38 डिग्री यानी कोहनी डालने पर बस हल्का गुनगुना लगे; साबुन बिना खुशबू वाला हो और हफ्ते में 2-3 बार नहलाना पर्याप्त है। कुछ चीज़ें डरा देती हैं पर सामान्य हैं: नाक-गाल पर सफेद दाने (मिलिया), पीठ पर नीले-भूरे निशान (मंगोलियन स्पॉट) और तीसरे-पांचवें दिन हल्का पीलापन — पर पीलापन हथेली और तलवों तक पहुंचे या बच्चा दूध कम कर दे तो उसी दिन जांच कराएं।

नींद: सुरक्षित सुलाने का तरीका

नवजात चौबीस घंटे में 14 से 17 घंटे सोता है, पर 2-3 घंटे के टुकड़ों में। सबसे ज़रूरी नियम एक ही है: शिशु को हमेशा पीठ के बल सुलाएं, पेट के बल या करवट नहीं — यह अचानक शिशु मृत्यु (SIDS) का खतरा घटाने का सबसे असरदार तरीका है। गद्दा सख्त और समतल हो, चादर कसी हुई; तकिया, मोटी रज़ाई, तौलिये का रोल और खिलौने पालने से बाहर रखें।

शिशु आपके कमरे में हो, पर आपके बिस्तर पर नहीं — नरम गद्दे या भारी रज़ाई वाले बिस्तर पर साथ सुलाना जोखिम भरा है। कपड़े में लपेटना ठीक है, पर छाती पर ढीला रखें ताकि सांस ले सके और कूल्हे हिल सकें; ज़रूरत से ज़्यादा गर्म कपड़े भी नुकसानदेह हैं। दिन में पर्दे खुले रखें और सामान्य आवाज़ें चलने दें, रात में रोशनी मद्धम रखें। जागते हुए रोज़ 2-3 मिनट, दो-तीन बार पेट के बल लिटाएं (टमी टाइम) — इससे गर्दन मज़बूत होती है और सिर पीछे से चपटा नहीं होता।

पहले महीने की चेकलिस्ट: टीके, कागज़ और रोज़ की गिनती

जन्म पर: बीसीजी, हेपेटाइटिस-बी की पहली खुराक, ओपीवी-0 और विटामिन-के का इंजेक्शन। छठे हफ्ते पर: पेंटावेलेंट-1, ओपीवी-1, रोटावायरस-1, आईपीवी और जहां उपलब्ध हो पीसीवी-1 — सरकारी अस्पताल और आंगनवाड़ी में ये मुफ्त हैं। एमसीपी कार्ड या आईएपी का टीकाकरण कार्ड संभालकर रखें और हर टीके की तारीख दर्ज कराएं। कागज़ों में दो काम पहले महीने में निपटा लें: जन्म प्रमाणपत्र के लिए आवेदन (21 दिन के भीतर आसान रहता है) और आंगनवाड़ी में नाम दर्ज कराना। रोज़ एक कागज़ पर लिखें: कितनी बार दूध, कितने गीले डायपर, कितनी बार पॉटी।

इनमें से कोई भी संकेत दिखे तो उसी दिन डॉक्टर के पास जाएं: 100.4 डिग्री फारेनहाइट (38 डिग्री सेल्सियस) से ऊपर बुखार या शरीर असामान्य ठंडा पड़ना, दूध बिल्कुल न पीना, बहुत सुस्ती या जगाने पर न जागना, एक मिनट में 60 से ज़्यादा सांस, सांस लेते समय पसलियां धंसना या घुरघुराहट, बार-बार या हरी उल्टी, 12 घंटे तक पेशाब न होना, हथेली-तलवों तक पीलापन, नाभि के आसपास लाली या मवाद, और दौरे जैसी हरकत। तीन महीने से छोटे शिशु में बुखार हमेशा आपात स्थिति है। दवा खुद न दें — पैरासिटामोल की मात्रा शिशु के वज़न से डॉक्टर तय करते हैं, और एस्पिरिन बच्चों को कभी नहीं दी जाती। साधन न हो तो 108 एम्बुलेंस मुफ्त है।

दादी-नानी कहती हैं vs डॉक्टर कहते हैं

दादी: थोड़ी घुट्टी या शहद चटा दो, पेट साफ रहेगा। डॉक्टर: नवजात को मां के दूध के अलावा कुछ भी देने से संक्रमण और दस्त का सीधा खतरा है, और एक साल से पहले शहद से बोटुलिज़्म हो सकता है। दादी: आंखों में काजल लगाओ। डॉक्टर: घर या बाज़ार के काजल में अकसर सीसा (लेड) होता है, जो दिमाग के विकास को नुकसान पहुंचाता है और आंखों में जलन भी करता है — नज़र वाला काला टीका पैर के तलवे या कान के पीछे लगाइए, आंख से दूर।

दादी: नाक रोज़ दबाओ तो तीखी होगी, टांगें खींचकर सीधी करो। डॉक्टर: चेहरे की बनावट जीन तय करते हैं; दबाने से सिर्फ नाज़ुक हड्डी और त्वचा को चोट पहुंचती है, और कान-नाक में तेल डालना या उल्टा लटकाना खतरनाक है — यह दाई को साफ बता दें। पर बड़ों की कही कई बातें बिल्कुल सही हैं: शिशु को छाती से लगाकर रखना (कंगारू मदर केयर, जो कम वज़न वाले शिशुओं में जान बचाने वाला साबित हुआ है), मालिश और सुबह की सीमित धूप, और घर आने वालों की भीड़ कम रखना।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: कैसे पता चले कि दूध पर्याप्त मिल रहा है? — तीन चीज़ों से: दिन में 6 या ज़्यादा गीले डायपर, 10-14 दिन में जन्म का वज़न वापस आना, और दूध पीने के बाद शिशु का शांत होकर सो जाना।

सवाल: बच्चा शाम को घंटों रोता है, क्या यह गैस है? — 2 से 6 हफ्ते के बीच शाम की रुलाई बहुत आम है और अकसर तीन महीने तक अपने आप ठीक हो जाती है। हर फीड के बाद कंधे से लगाकर डकार दिलाएं; घुट्टी या ग्राइप वॉटर बिना डॉक्टर से पूछे न दें।

सवाल: नवजात को धूप दिखाना ज़रूरी है? — सुबह 8 से 10 बजे के बीच 10-15 मिनट हल्की धूप काफी है, आंखों को बचाकर। पीलिया के इलाज के लिए धूप भरोसेमंद नहीं — उसके लिए डॉक्टर की जांच ज़रूरी है।

सवाल: पहले महीने में मेहमान आने दें या नहीं? — कम रखें, और जो शिशु को गोद ले वह पहले हाथ धोए। खांसी-जुकाम वाले किसी को शिशु के पास न आने दें; इस उम्र में सामान्य वायरस भी भारी पड़ सकता है।

नवजात शिशुशिशु देखभालनए माता-पितास्तनपानटीकाकरण

समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम