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चीन में AI की दौड़ बचपन से शुरू हो चुकी है — भारतीय माता-पिता के लिए इसमें 5 सबक

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चीन में AI की दौड़ बचपन से शुरू हो चुकी है — भारतीय माता-पिता के लिए इसमें 5 सबक

हांगझोऊ में गर्मी की छुट्टियों के AI कैंप, वायरल होती इंटर्नशिप सैलरी और 2030 तक हर स्कूल में AI पढ़ाने की सरकारी योजना — चीन बच्चों की AI शिक्षा पर देश की तरह दांव लगा रहा है. भारतीय माता-पिता के लिए इसमें नक़ल करने लायक़ भी कुछ है, और बचने लायक़ भी.

हांगझोऊ की गर्मी की छुट्टी: 13 साल का बच्चा और उसका AI प्रोजेक्ट

सिंगापुर के समाचार नेटवर्क CNA की एक हालिया रिपोर्ट में एक दृश्य है जो ठहरकर पढ़ने लायक़ है: गर्मी की छुट्टियों में 13 साल का एक बच्चा शंघाई से हांगझोऊ जाकर पांच दिन के AI कैंप में बैठा है — फिनटेक कंपनी एंट ग्रुप के मुख्यालय में, 12 से 18 साल के बीस और बच्चों के साथ. ब्रेक की घोषणा होती है तो कई बच्चे लैपटॉप साथ उठाए घूमते हैं — प्रोजेक्ट छोड़ने का मन नहीं.

प्रोजेक्ट भी ग़ौर करने लायक़ हैं: उस बच्चे की टीम ने बुज़ुर्गों के लिए 'स्मार्ट दवा-डिब्बा' बनाया जो समय पर सही ख़ुराक याद दिलाए — विचार अपनी दादी से आया, जो अक्सर भूल जाती हैं कि दवा ली या नहीं. एक 12 साल की बच्ची ने सांस्कृतिक विरासत पर गेम का प्रोटोटाइप बनाया; एक और ने दिव्यांगों की आपसी मदद का ऐप — 'वे सिर्फ़ मदद पाना नहीं चाहते, अपनी ताक़त से दूसरों की मदद भी करना चाहते हैं.'

यह अकेला कैंप नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक़ टेनसेंट ने भी इसी साल किशोरों के लिए AI कैंप शुरू किए हैं; चीन का AI-शिक्षा बाज़ार 2027 तक क़रीब 22 अरब डॉलर छूने का अनुमान है; और अप्रैल में पांच मंत्रालयों की साझा योजना ने 2030 तक स्कूली पढ़ाई के हर स्तर पर 'AI-प्लस शिक्षा' का लक्ष्य रख दिया है. यानी यह किसी शौक़ीन शहर का ट्रेंड नहीं — राष्ट्रीय नीति है.

पैसे की दौड़, और मां-बाप की घबराहट

इस दौड़ का ईंधन साफ़ है. रिपोर्ट में एक वायरल स्क्रीनशॉट का ज़िक्र है: एक शीर्ष विश्वविद्यालय के छात्र को AI कंपनी की इंटर्नशिप का ऑफ़र — 5,500 युआन प्रतिदिन, यानी महीने का हिसाब लगाएं तो आम ग्रेजुएट की औसत तनख़्वाह का क़रीब उन्नीस गुना. सच्चाई जो भी हो, संदेश करोड़ों माता-पिता तक वही पहुंचा: AI आया तो सोना बरसा.

और जहां घबराए माता-पिता हों, वहां बाज़ार देर नहीं करता. चीन में AI कैंपों की क़ीमतें कुछ सौ युआन से बीस हज़ार युआन के ऊपर तक हैं — पांच-सितारा होटल और 'पेटेंट फ़ाइल करना सिखाएंगे, दाख़िले में काम आएगा' जैसे वादों समेत. ख़ुद एंट के कैंप की मुखिया ने CNA से दो टूक कहा: ऐसे संस्थान सचमुच मौजूद हैं जो 'चिंता बेचते हैं, और उसी चिंता से कमाई करते हैं.'

यह वाक्य भारतीय माता-पिता को जाना-पहचाना लगेगा. कोविड के दौर की कोडिंग-क्लास मार्केटिंग याद कीजिए — छह साल के 'ऐप बनाकर करोड़ों कमाने वाले' काल्पनिक बच्चों के विज्ञापन, जिन पर आख़िरकार विज्ञापन-निगरानी की फटकार पड़ी थी. डर की मार्केटिंग हर बाज़ार में एक जैसी है — सिर्फ़ विषय बदलता है: कल कोडिंग, आज AI.

भारत कहां खड़ा है

अच्छी ख़बर यह है कि भारत इस मामले में दर्शक नहीं है. CBSE कई साल से कक्षा 8 से 12 के लिए AI को वैकल्पिक विषय के तौर पर चला रहा है; राष्ट्रीय शिक्षा नीति कक्षा 6 से कम्प्यूटेशनल सोच और कोडिंग की बात करती है; और अटल टिंकरिंग लैब जैसी योजनाओं के तहत हज़ारों सरकारी-निजी स्कूलों में रोबोटिक्स-इलेक्ट्रॉनिक्स की प्रयोगशालाएं पहुंची हैं. यानी बुनियादी ढांचा — कम से कम काग़ज़ पर — बन रहा है.

फ़र्क़ रफ़्तार और बंटवारे का है: महानगर के निजी स्कूल का बच्चा और छोटे शहर के स्कूल का बच्चा इस समय दो अलग दुनियाओं में हैं. इसीलिए अगले कुछ साल में भारत में भी वही होगा जो चीन में हो रहा है — स्कूल के बाहर का बाज़ार खाई पाटने (और डर बेचने) दोनों के लिए दौड़ेगा. माता-पिता के तौर पर तैयारी का मतलब है: दोनों को पहचानना सीखना.

एक और सच भी दर्ज रहे: हर बच्चे को AI इंजीनियर नहीं बनना — न बनना चाहिए. दौड़ का मतलब यह नहीं कि हर बच्चा उसी ट्रैक पर दौड़े; मतलब इतना है कि आने वाली हर नौकरी — डॉक्टर, वकील, डिज़ाइनर, दुकानदार — में AI औज़ार की तरह मौजूद होगा, और औज़ार चलाना आना चाहिए. बिजली आने पर हर आदमी इलेक्ट्रिशियन नहीं बना था — पर स्विच सबको दबाना आ गया था.

चीन के कैंप से असली सबक: डर नहीं, बनाने का मज़ा

CNA की रिपोर्ट की सबसे क़ीमती बात कोई आंकड़ा नहीं — कैंप चलाने वाली टीम की दो बातें हैं. पहली: बच्चों को आगे ले जाने वाली चीज़ चिंता नहीं होनी चाहिए — 'जब वे सचमुच AI से वह चीज़ बना लेते हैं जो बनाना चाहते थे, तो वही हौसला उन्हें और बेहतर करने की ओर ले जाता है.' यानी इंजन जिज्ञासा है, ईंधन कामयाबी का स्वाद — डर नहीं.

दूसरी बात और भी काम की: जब बच्चे तय कर रहे थे कि बनाना क्या है, तब वे AI इस्तेमाल ही नहीं कर रहे थे. दादी की दवा, दिव्यांगों की मदद — 'ये AI-युग की समस्याएं नहीं हैं; ये हमेशा से मौजूद समस्याएं हैं.' AI सिर्फ़ हल बनाने का नया औज़ार था. यानी जो हुनर सबसे पहले चाहिए, वह प्रॉम्प्ट लिखना नहीं — समस्या देखना, सवाल पूछना और लोगों की तकलीफ़ समझना है. और वह हुनर किताबों, बातचीत, मोहल्ले और ऊब से आता है — किसी ऐप से नहीं.

इसीलिए 13 साल के जिस बच्चे ने कैंप में कहा कि 'AI चलाना आ गया तो हम बाहर नहीं होंगे' — उसकी बात आधी ही सही है. मशीन चलाना ज़रूरी है; पर मशीन से क्या बनवाना है, यह सोच ही असली पूंजी रहेगी. रटा हुआ प्रॉम्प्ट कल पुराना हो जाएगा; सवाल पूछने वाला दिमाग़ नहीं.

उम्र के हिसाब से: घर पर क्या करें

प्राइमरी (5-10 साल): इस उम्र में 'AI कोर्स' नहीं चाहिए. चाहिए वह ज़मीन जिस पर आगे सब उगता है: ब्लॉक-पहेली-लेगो जैसी चीज़ों से तर्क, बोर्ड गेम से नियम-सोच, ख़ूब किताबें, और स्क्रीन के वही घर के नियम जो हमारी डिजिटल परवरिश वाली गाइड में हैं. करना ही हो तो Scratch जैसे मुफ़्त, खेल-जैसे टूल पर हफ़्ते में एकाध घंटा साथ बैठकर — बच्चा 'कोड' नहीं, 'कहानी को निर्देश देना' सीख रहा होता है, और उतना काफ़ी है.

मिडिल स्कूल (10-14): अब जिज्ञासा को औज़ार दीजिए — पर मुफ़्त और खुले रास्तों से शुरुआत कीजिए: Scratch से आगे Code.org जैसे प्लेटफ़ॉर्म, स्कूल में CBSE का AI विषय मिले तो ज़रूर, अटल टिंकरिंग लैब हो तो उसका पूरा इस्तेमाल. AI चैटबॉट-इमेज टूल बच्चे के साथ बैठकर आज़माइए और वहीं दो चीज़ें साथ सिखाइए — यह ग़लत भी बोलता है (जांचना हमारा काम है), और होमवर्क इससे 'करवाना' सीखना नहीं, धोखा है. इस उम्र का सबसे अच्छा प्रोजेक्ट वही है जो चीन के कैंप वाले बच्चों का था: घर की किसी असली समस्या का छोटा हल.

किशोर (14-18): अब गहराई का समय है — रुचि हो तो Python, असली प्रोजेक्ट, स्कूल-स्तर की प्रतियोगिताएं और इंटरनेट पर मौजूद विश्वस्तरीय मुफ़्त कोर्स. पर इस उम्र में सबसे क़ीमती सलाह तकनीकी नहीं है: पोर्टफ़ोलियो (बनाई हुई चीज़ें) रटे सर्टिफ़िकेटों से ज़्यादा बोलता है, और नींद-दोस्ती-मैदान की क़ीमत पर कोई कोर्स नहीं. AI ही सीखना है, यह भी ज़रूरी नहीं — जो बच्चा इतिहास या जीव-विज्ञान में डूबा है, वह अपने क्षेत्र में AI का इस्तेमाल सीखकर उतना ही आगे रहेगा.

पैसा लगाने से पहले: कोर्स-कैंप जांचने के 5 सवाल

एक — यह कोर्स डर बेच रहा है या मज़ा? विज्ञापन की भाषा पढ़िए: 'पीछे छूट जाएगा', 'अभी नहीं तो कभी नहीं' सुनाई दे तो वहीं रुक जाइए. अच्छी शिक्षा हमेशा 'क्या बना पाएगा' बताती है, 'क्या छिन जाएगा' नहीं. दो — पैसे के बदले मिलेगा क्या, जो मुफ़्त में नहीं मिलता? Scratch, Code.org, यूट्यूब के अच्छे चैनल और CBSE की सामग्री मुफ़्त हैं; भुगतान वाला कोर्स तभी सार्थक है जब वह मार्गदर्शन, साथी और असली प्रोजेक्ट दे.

तीन — पढ़ाएगा कौन? 'IIT-वाले मेंटर' के दावे की जगह पूछिए: मेरे बच्चे के बैच में कितने बच्चे, पढ़ाने वाले का नाम-अनुभव क्या, एक डेमो क्लास दिखाइए. चार — नतीजा क्या गिना जाएगा? 'सर्टिफ़िकेट' जवाब नहीं है; 'बच्चा अपना बनाया प्रोजेक्ट दिखाएगा' जवाब है. पांच — उम्र सही है? आठ साल के बच्चे को 'AI मास्टरक्लास' बेचने वाला ख़ुद बता रहा है कि उसे बच्चे नहीं, आपकी जेब दिख रही है.

और आख़िरी कसौटी घर की है: कोर्स के बाद बच्चा और सवाल पूछने लगे, चीज़ें तोड़कर-जोड़कर देखने लगे — पैसा वसूल. सिर्फ़ थका हुआ और 'अगली क्लास कब है' से डरा हुआ लौटे — तो जो भी बचा है, वह फ़ीस ही सही, आगे मत डालिए.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: क्या मेरा बच्चा AI नहीं सीखेगा तो सच में पीछे रह जाएगा? — 'AI चलाना' आने वाले वक़्त में उतना ही सामान्य होगा जितना आज टाइपिंग — यानी हां, हर बच्चा इसे बरतना सीखेगा, और ज़्यादातर स्कूल के रास्ते ही सीख जाएंगे. पर 'पीछे रह जाएगा' वाली घड़ी की सुई किसी कोर्स-विक्रेता के हाथ में नहीं है. दस साल की उम्र में शुरुआत और चौदह की उम्र में शुरुआत का फ़र्क़ करियर में लगभग शून्य है — जिज्ञासा ज़िंदा रहना ही असली बढ़त है.

सवाल: बच्चा ChatGPT से होमवर्क कराने लगा है — रोकूं या सीखने दूं? — दोनों: औज़ार रहने दीजिए, नक़ल रोकिए. नियम साफ़ रखिए — AI से समझना ठीक ('मुझे यह समझा दो'), AI से करवाकर अपना नाम लिखना ग़लत. साथ बैठकर एक दिन यह भी दिखाइए कि AI आत्मविश्वास से ग़लत जवाब भी देता है — एक पकड़ी हुई ग़लती सौ नसीहतों से बेहतर सिखाती है कि जांच हमेशा इंसान की ज़िम्मेदारी है.

सवाल: हमारे शहर में न अच्छे कैंप हैं, न हमारे पास बड़ी फ़ीस — क्या बच्चा वंचित रह जाएगा? — नहीं. इस क्षेत्र की सबसे अनोखी बात यही है कि दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शिक्षण मुफ़्त इंटरनेट पर पड़ा है — Scratch से लेकर विश्वविद्यालयों के खुले कोर्स तक. चाहिए बस एक साधारण डिवाइस, इंटरनेट और साथ बैठने वाला बड़ा. चीन की रिपोर्ट में भी यही दर्ज है — महंगे कैंप ख़ास तबके की चीज़ हैं; हुनर की सीढ़ी नहीं.

सवाल: बेटी की रुचि ड्रॉइंग-कहानियों में है, टेक में बिलकुल नहीं. ज़बरदस्ती करूं? — बिलकुल नहीं — पर पुल ज़रूर बनाइए: ड्रॉइंग वाली बच्ची को AI इमेज-टूल, कहानी वाली को अपनी कहानी का ऑडियो-एनीमेशन बनवाकर दिखाइए. 'टेक बनाम कला' झूठा बंटवारा है — आने वाले दौर में AI कला का भी औज़ार है. रुचि की सवारी कीजिए, धारा मत बदलिए — यही नियम यहां भी है.

सवाल: चीन जैसी होड़ देखकर लगता है हम बहुत धीमे हैं. — रिपोर्ट का आख़िरी हिस्सा फिर पढ़िए: वहां भी सबसे समझदार आवाज़ें रफ़्तार की नहीं, दिशा की बात कर रही हैं — चिंता से नहीं, बनाने के आनंद से. दौड़ देशों के बीच है; आपके घर में सिर्फ़ एक बच्चा है, जिसे तेज़ नहीं, मज़बूत चलना सीखना है. उसकी रफ़्तार का पैमाना बीजिंग या बेंगलुरु नहीं — उसका अपना पिछला साल है.

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समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम