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टेक्नोलॉजी के दौर की परवरिश: स्क्रीन से लड़ाई नहीं, घर के नियम

परवरिश और व्यवहार · theAsianparent · अपडेट किया गया

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टेक्नोलॉजी के दौर की परवरिश: स्क्रीन से लड़ाई नहीं, घर के नियम

यह पहली पीढ़ी है जो फ़ोन पकड़कर पैदा हुई है, और हम पहले माता-पिता हैं जिन्हें इसका कोई ख़ानदानी तजुर्बा नहीं. अच्छी ख़बर: परवरिश के पुराने नियम यहाँ भी चलते हैं — सीमाएँ, उदाहरण और साथ बैठना.

पहला सच: तकनीक जा नहीं रही — रिश्ता तय करना है

स्क्रीन पर बहस अक्सर दो सिरों पर अटकती है — 'बिलकुल नहीं' बनाम 'क्या करें, ज़माना ही ऐसा है.' दोनों से काम नहीं चलता. बच्चा उसी दुनिया में बड़ा होगा जहाँ पढ़ाई, दोस्ती, काम — सब स्क्रीन से गुज़रते हैं; उसे तकनीक से बचाना नहीं, तकनीक बरतना सिखाना है — जैसे सड़क से नहीं बचाते, सड़क पार करना सिखाते हैं.

उम्र का मोटा नक्शा (कितनी स्क्रीन, किस उम्र में — इसका ब्योरा हमारे स्क्रीन टाइम वाले लेख में है): दो साल तक वीडियो-कॉल के सिवा स्क्रीन से कुछ नहीं मिलता; दो से पाँच में थोड़ा और चुना हुआ, साथ बैठकर; स्कूल की उम्र में सवाल 'कितनी देर' से बढ़कर 'क्या और किसके साथ' हो जाता है.

इस लेख का काम आगे की बात है: घर के नियम कैसे बनें, अपनी आदत का क्या करें, और ऑनलाइन दुनिया में बच्चे की हिफ़ाज़त कैसे हो.

घर का मीडिया-प्लान: नियम सबके, सिर्फ़ बच्चे के नहीं

नियम वही टिकते हैं जो पूरे घर पर लागू हों. तीन जगहें और एक समय स्क्रीन-मुक्त तय कीजिए: खाने की मेज़, बेडरूम (सोने से एक घंटा पहले सबके फ़ोन बाहर), और सुबह की तैयारी का समय. 'सबके' का मतलब सचमुच सबके — पापा का दफ़्तर वाला फ़ोन भी खाने की मेज़ पर नहीं.

छोटे बच्चे के लिए नियम समय से बेहतर ढाँचे में बँधते हैं: 'शाम को खेल के बाद, एक एपिसोड, हॉल में' — यह 'तीस मिनट' से बेहतर काम करता है, क्योंकि एपिसोड ख़त्म होना दिखता है, मिनट नहीं. ख़त्म होने का इंतज़ाम पहले से: 'यह एपिसोड आख़िरी — फिर क्या करोगे, ब्लॉक या रंग?' अगली चीज़ तैयार हो तो स्क्रीन छोड़ना आधा आसान है.

स्क्रीन को इनाम-सज़ा की करेंसी मत बनाइए — 'होमवर्क करोगे तो मोबाइल' स्क्रीन की क़ीमत और बढ़ा देता है. वह बस दिन की एक चीज़ रहे, ट्रॉफ़ी नहीं.

और सामग्री का नियम सबसे ऊपर: छोटे बच्चे के लिए अपने-आप चलता यूट्यूब नहीं — चुने हुए ऐप/डाउनलोड, ऑटोप्ले बंद, और जहाँ तक हो, स्क्रीन घर की साझा जगह में. बंद कमरे का टैबलेट हर उम्र में ग़लती है.

आईना: बच्चे की स्क्रीन-आदत आपकी फ़ोटोकॉपी है

बच्चे स्क्रीन के नियम कान से नहीं, आँख से सीखते हैं. जो बच्चा माँ-पापा को हर ख़ाली पल में फ़ोन स्क्रॉल करते देखता है, वह 'फ़ोन कम देखो' का उपदेश नहीं सुनता — वह आदत देखता है. अपनी जाँच के लिए एक दिन गिनिए: बच्चे के सामने कितनी बार फ़ोन उठाया, और कितनी बार बच्चे की बात के बीच में.

'बीच में फ़ोन' का असर बड़ों की सोच से ज़्यादा है: खेल दिखाते बच्चे को 'हाँ-हाँ, देखा' कहते हुए स्क्रीन में डूबे माता-पिता — बच्चे इसे साफ़ पढ़ते हैं, और यहीं से या तो चिपकना बढ़ता है या बताना बंद होता है. दिन में कुछ हिस्से — स्कूल से लौटने का पहला आधा घंटा, सोने की रस्म — फ़ोन शारीरिक रूप से दूसरे कमरे में रखिए. जेब का फ़ोन जीतता है, दूसरे कमरे का हारता है.

अपनी ग़लती पर वही कीजिए जो बच्चे से चाहते हैं: 'मैं फ़ोन में लग गई थी, माफ़ करो — अब बताओ.' नियम तोड़कर मानना, नियम का सबसे अच्छा विज्ञापन है.

ऑनलाइन सुरक्षा: उम्र के साथ बढ़ती बातचीत

तकनीकी तालों से शुरुआत कीजिए, पर उन्हीं पर मत रुकिए. बुनियादी इंतज़ाम: बच्चे के डिवाइस पर पैरेंटल कंट्रोल/किड्स मोड, ऐप-स्टोर पर ख़रीद का पासवर्ड, यूट्यूब पर रेस्ट्रिक्टेड मोड, और घर के वाई-फ़ाई पर बुनियादी फ़िल्टर. यह ताले छोटी उम्र में काम करते हैं — और हर ताला बड़ा बच्चा खोलना सीख जाता है, इसीलिए असली सुरक्षा बातचीत है.

बातचीत के तीन नियम बच्चे को घुट्टी की तरह: निजी जानकारी (नाम-स्कूल-पता-फ़ोटो) ऑनलाइन किसी को नहीं; ऑनलाइन 'दोस्त' असल में अजनबी है — मिलने की बात कभी नहीं; और कुछ भी अजीब-डरावना-शर्मिंदा करने वाला दिखे तो स्क्रीन बंद करके सीधे हमें बताना — डाँट नहीं पड़ेगी, यह वादा पक्का.

वादा निभाइए भी: बच्चा कुछ ग़लत देखकर बताए और जवाब में फ़ोन ही छिन जाए, तो अगली बार वह बताएगा नहीं — छिपाएगा. रिपोर्टिंग का इनाम भरोसा है, ज़ब्ती नहीं.

गेमिंग-चैट की दुनिया में उम्र-रेटिंग देखिए (गेम की रेटिंग उतनी ही असली है जितनी फ़िल्म की), अनजान लोगों से वॉइस-चैट बंद रखिए, और पैसे वाले गेम (इन-ऐप ख़रीद, लूट-बॉक्स) पर पासवर्ड आपका. साइबर-धोखाधड़ी या ऑनलाइन शोषण जैसी स्थिति में राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 और cybercrime.gov.in पर शिकायत — यह नंबर भी फ़्रिज वाली सूची में जोड़ लीजिए.

तकनीक को औज़ार बनाइए: साथ बैठिए, साथ बनाइए

स्क्रीन की सबसे अच्छी सूरत साझा स्क्रीन है. जो भी देखे, कभी-कभी साथ देखिए — कार्टून पर हँसिए, वीडियो पर सवाल पूछिए ('यह ऐसा क्यों हुआ?'). साथ देखी स्क्रीन बातचीत बनती है, अकेली स्क्रीन खपत.

उपभोग से आगे रचना की ओर धकेलिए: फ़ोटो खींचना-सजाना, दादी को भेजने का वीडियो बनाना, ड्रॉइंग ऐप, बड़े बच्चों के लिए कोडिंग के खेल. 'स्क्रीन पर बनाया क्या?' — यह सवाल 'कितनी देर देखा' से बेहतर पैमाना है.

वीडियो-कॉल छोटों के लिए भी अच्छी स्क्रीन है — दूर के दादा-दादी से रोज़ की पाँच मिनट की कॉल रिश्ता भी है और भाषा भी. और तकनीक को घर के कामों से जोड़िए: मौसम देखना, रास्ता खोजना, नई रेसिपी — बच्चा देखे कि फ़ोन टाइमपास के अलावा काम की चीज़ है.

आख़िर में, हफ़्ते का हिसाब बराबर कीजिए: स्क्रीन जो भी चले, दिन में बाहर का खेल, किताब की कहानी और बिना-स्क्रीन की ऊब — तीनों की जगह बची रहे. ऊब से ही बच्चे के अपने खेल निकलते हैं, और वही असली ऐप है.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: बच्चा खाना ही नहीं खाता जब तक मोबाइल न मिले. — यह जोड़ी जितनी जल्दी टूटे उतना अच्छा — स्क्रीन देखते बच्चे को पेट भरने का पता ही नहीं चलता. तोड़ने का तरीक़ा: एलान + विकल्प + हफ़्ते भर की हिम्मत. 'अब खाना बिना फ़ोन के होगा' — पहले दिन हंगामा होगा, तीसरे दिन कम, हफ़्ते में ख़त्म. खाने की मेज़ पर बात, कहानी या सिर्फ़ खाना — भूख अपना काम खुद करती है. शर्त एक: बड़ों की थाली के साथ भी फ़ोन नहीं.

सवाल: पाँच साल के बच्चे के लिए अपना टैबलेट लेना ठीक है? — 'अपना' शब्द से दिक़्क़त शुरू होती है — इस उम्र में डिवाइस घर का हो, बच्चे का नहीं: साझा टैबलेट, माँ-पापा के पासवर्ड से खुले, तय समय पर मिले, हॉल में चले. अपना निजी डिवाइस जितनी देर से आए उतना अच्छा — और जब आए (बड़ी कक्षाओं में), तो नियमों के पैकेज के साथ आए.

सवाल: बड़ा बच्चा कहता है 'सब दोस्तों के पास फ़ोन/गेम है, मेरे ही पास नहीं.' — आधा सच होगा, पर फ़ैसला मोहल्ले के सर्वे से नहीं, आपके घर के नियम से होगा — यह बच्चे को प्यार से कहिए. बीच के रास्ते होते हैं: दोस्तों वाला गेम साझा टैबलेट पर, हफ़्ते के तय दिनों में; फ़ोन की जगह घर का नंबर/स्मार्टवॉच जैसी सीमित चीज़. और दूसरे माता-पिता से सच में बात कीजिए — अक्सर 'सबके पास' निकलता है 'दो के पास.'

सवाल: रील्स-शॉर्ट्स बच्चे के लिए इतने बुरे क्यों कहे जाते हैं? — छोटा-तेज़-अंतहीन वीडियो ध्यान को छोटी-तेज़ ख़ुराकों की आदत डालता है — फिर किताब, क्लास और धीमा खेल फीके लगते हैं. छोटे बच्चे के लिए ऑटोप्ले-फ़ीड वाले ऐप ही मत खोलिए; बड़े बच्चे के साथ समय की सीमा और 'फ़ीड नहीं, चुना हुआ' का नियम रखिए. और यही नियम अपनी रील-आदत पर भी आज़माइए — कठिन है, पता है.

सवाल: बच्चे की ऑनलाइन क्लास/होमवर्क स्क्रीन टाइम में गिनें? — पढ़ाई की स्क्रीन और मनोरंजन की स्क्रीन एक खाते में मत जोड़िए — नियम मनोरंजन वाली पर लगते हैं. हाँ, ऑनलाइन क्लास के लंबे दिन पर आँखों-शरीर का ख़याल दोनों पर लागू है: हर बीस-तीस मिनट पर नज़र दूर, बीच में उठना-टहलना, और दिन के अंत में स्क्रीन के बदले मैदान-किताब का हिस्सा थोड़ा बड़ा.

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समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम