
मंत्र जादू नहीं होते — छोटे, रटे हुए वाक्य होते हैं जो कठिन पल में दिमाग़ को पकड़ने की जगह देते हैं. ये बीस वाक्य लाखों माँओं के आज़माए हुए हैं. जो चुभे, वही आपका है.
1. 'काफ़ी अच्छी माँ ही सबसे अच्छी माँ है.' — परफ़ेक्ट माँ बच्चों की किताबों में भी नहीं होती. बच्चे को हर पल सही जवाब वाली माँ नहीं चाहिए — मौजूद, प्यार करने वाली, और ग़लती पर 'माफ़ करना' कह सकने वाली माँ चाहिए.
2. 'मैं बुरी माँ नहीं — थकी हुई माँ हूँ.' — दिन के सबसे काले ख़याल अक्सर रात की सबसे कम नींद से निकलते हैं. जो पल ख़ुद पर मुक़दमा चलाने का लगे, वह असल में सोने-खाने-साँस लेने का पल है.
3. 'चिल्लाना हो गया — अब मरम्मत होगी.' — ग़ुस्सा हर घर में होता है; फ़र्क़ मरम्मत का है. 'मम्मी ज़ोर से बोली, माफ़ करना' — यह वाक्य बच्चे को सिखाता है कि रिश्ते टूटते नहीं, जुड़ते कैसे हैं.
4. 'मेरा आराम भी परिवार के काम की चीज़ है.' — माँ का अपने लिए रुकना ख़र्च नहीं, घर की बैटरी की चार्जिंग है. जलते दीये से ही दीया जलता है.
5. 'आज का स्कोर बच्चे की मुस्कान से गिनूँगी, अपनी ग़लतियों से नहीं.' — दिन के अंत में दिमाग़ ग़लतियों की सूची लाएगा; उसे दिन का एक अच्छा पल दिखाइए. दोनों सच हैं — चुनना आपके हाथ में है.
6. 'तुलना चोर है — मेरे बच्चे की भी, मेरी भी.' — दूसरे का बच्चा पहले बोला, पहले चला — इससे आपके बच्चे की घड़ी नहीं बदलती. हर बच्चा अपनी घड़ी पर चलता है, और माँ की घड़ी भी अपनी होती है.
7. 'इंस्टाग्राम किसी की झलक है, मेरी ज़िंदगी पूरी फ़िल्म.' — सजी रसोई और शांत बच्चे की तस्वीर के पीछे भी वही बिखरा घर है. झलक से फ़िल्म की तुलना हमेशा हार है — स्क्रॉल रोकिए, अपनी फ़िल्म देखिए.
8. 'राय सबकी, फ़ैसला मेरा.' — दूध से लेकर स्कूल तक हर फ़ैसले पर दस राय मिलेंगी — मुफ़्त और बिन माँगी. सुनने की तमीज़ रखिए, मानने की मजबूरी नहीं. बच्चे को आप जानती हैं, मोहल्ला नहीं.
9. 'जो मेरे घर नहीं आते, उनकी बातें मेरे घर में नहीं रहेंगी.' — रिश्तेदारों-पड़ोसियों के तानों को घर के अंदर तक ढोना अपने ऊपर दोहरा टैक्स है. दरवाज़े पर ही छोड़िए.
10. 'माँ बनकर भी मैं 'मैं' हूँ.' — माँ बनना पहचान का विस्तार है, विलोप नहीं. जो चीज़ आपको आप बनाती थी — काम, सहेली, गाना, अकेली चाय — उसकी वापसी बच्चे से बग़ावत नहीं है.
11. 'यह दौर है — दौर गुज़रते हैं.' — रातों का जागना, चिपकू महीने, नखरों का साल — जो अभी अनंत लगता है, वह पीछे मुड़कर एक झपकी लगता है. दाँत निकल आते हैं, नींद लौट आती है.
12. 'बच्चा मुझे तंग नहीं कर रहा — वह ख़ुद तंग है.' — चीख़ता बच्चा आपके ख़िलाफ़ नहीं है; वह अपनी छोटी दुनिया के बड़े तूफ़ान में है, और किनारा आप हैं. यह एक पंक्ति ग़ुस्से को आधा कर देती है.
13. 'पहले साँस, फिर जवाब.' — नखरे और बदतमीज़ी के बीच का एक गहरा साँस वह जगह है जहाँ पछतावे वाला वाक्य रुक जाता है. साँस मुफ़्त है, पछतावा महँगा.
14. 'मुझे पूरा दिन नहीं सँभालना — बस अगला एक घंटा.' — बीमारी, अकेली शाम या लंबी छुट्टी का दिन पूरा सोचकर भारी है. घड़ी को टुकड़ों में काटिए: बस नहाना करा लूँ. बस खाना. बस यह घंटा.
15. 'मदद माँगना भी माँ का हुनर है.' — 'मैं कर लूँगी' बहादुरी है, पर 'तुम यह पकड़ो' समझदारी. जो माँ बाँटना जानती है, वह लंबी पारी खेलती है.
16. 'बच्चे मेरी बातें भूल जाएँगे, मेरा होना याद रखेंगे.' — बीस साल बाद बच्चे को न मेन्यू याद रहेगा न खिलौनों की गिनती — याद रहेगा कि घर कैसा महसूस होता था. मौजूदगी सामान से बड़ी है.
17. 'घर बच्चों के रहने से बिखरा है — यह उजड़ा नहीं, बसा हुआ दिखता है.' — बिखरे खिलौने चलती ज़िंदगी के निशान हैं. सफ़ाई ज़रूरी है, पर बिखराव पर शर्म ज़रूरी नहीं.
18. 'ना कहना भी परवरिश है.' — बच्चे की हर माँग की हाँ प्यार नहीं है, और आपकी हर 'ना' ज़ुल्म नहीं. सीमा वाला प्यार ही टिकाऊ प्यार है — बच्चे के लिए भी, अपने कैलेंडर के लिए भी.
19. 'आज जो नहीं हो पाया, वह कल की सूची है — आज की सज़ा नहीं.' — दिन की अधूरी सूची रात को अदालत न बने. काम कल भी रहेगा; आज की नींद आज ही मिलती है.
20. 'मैं इस बच्चे के लिए चुनी गई माँ हूँ.' — जिस दिन सब ग़लत लगे, यह याद रखिए: इस बच्चे को ठीक इसी माँ की कहानी मिलनी थी — इन्हीं ग़लतियों, इन्हीं गलबहियों के साथ. और वह कहानी अच्छी चल रही है.
बीस में से सब आपके नहीं हैं — पढ़ते हुए जो दो-तीन चुभे, वही आपके हैं. उन्हें वहाँ लिखिए जहाँ कठिन पल में नज़र पड़ती है: फ़्रिज, बाथरूम का शीशा, फ़ोन का लॉक-स्क्रीन. मंत्र का काम रटने पर नहीं, सामने पड़ने पर चलता है.
और एक मंत्र किसी और माँ को भेजिए — वही जो आज आपके काम आया. जिस दौर में यह पढ़ा जा रहा है, उसी दौर में आपकी कोई सहेली भी है — रात की फीड में, नखरों की दोपहर में. एक वाक्य की चिट्ठी भी साथ होती है.
आख़िरी बात: मंत्र सहारा हैं, इलाज नहीं. उदासी-बोझ-अपराधबोध हफ़्तों से रोज़ का साथी हो, तो ज़रूरत वाक्य की नहीं, बात करने की है — घर में किसी से, और डॉक्टर से. वह क़दम भी उतना ही माँ वाला क़दम है जितना बाक़ी उन्नीस मंत्र.
सवाल: यह मंत्र-वंत्र सच में काम करते हैं या बस अच्छी बातें हैं? — रटे हुए छोटे वाक्य कठिन पल में सच में काम करते हैं — मनोविज्ञान इसे self-talk कहता है: तनाव के पल में दिमाग़ जो पहला वाक्य पकड़ता है, वही दिशा तय करता है. मंत्र वह पहला वाक्य पहले से रखने की तरकीब है. शर्त बस एक: वाक्य आपका चुना हुआ हो और सामने रखा हो.
सवाल: पिता के लिए भी ऐसे मंत्र चाहिए या यह माँओं की चीज़ है? — हर एक मंत्र पापा पर भी वैसा ही लागू है — अपराधबोध, तुलना, थकान और मरम्मत की ज़रूरत माँ की जागीर नहीं. यह सूची पापा के फ़ोन पर भी उतनी ही जगह की हक़दार है — और जिस घर में दोनों की भाषा में 'पहले साँस, फिर जवाब' चलता है, वहाँ बच्चा तीसरा मंत्र-धारी अपने आप बनता है.
सवाल: सबसे पहले कौन-सा मंत्र अपनाऊँ? — जो पढ़ते हुए गला भारी कर गया, वही. आम तौर पर नई माँओं में सबसे ज़्यादा काम नंबर 1 (काफ़ी अच्छी माँ), नंबर 11 (यह दौर है) और नंबर 13 (पहले साँस) आते हैं. एक से शुरू कीजिए — बीस वाक्य याद रखना इक्कीसवाँ बोझ बन जाएगा.
सवाल: जिस दिन कोई मंत्र काम न करे और सब भारी लगे? — उस दिन मंत्र का काम बस इतना है: याद दिलाना कि भारी दिन का इलाज वाक्य नहीं, इंसान होते हैं. किसी को कहिए — 'आज मुश्किल है.' पति, माँ, सहेली, डॉक्टर — कोई एक. मंत्र नंबर 15 असल में बाक़ी उन्नीस का दरवाज़ा है.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम