मां की सेहत

थकी माँ की सुबह: दिन शुरू होने से पहले हारने से बचाने वाली 9 तरकीबें

मां की सेहत · theAsianparent · अपडेट किया गया

Google पर पसंदीदा
थकी माँ की सुबह: दिन शुरू होने से पहले हारने से बचाने वाली 9 तरकीबें

माँ की सुबह दिन की सबसे भारी शिफ़्ट है — और वह शुरू होती है अधूरी नींद से. जादू की गोली नहीं है; तरकीबें हैं — छोटी, आज़माई हुई, और आधी तो रात में ही हो जाने वाली.

सुबह रात में बनती है

सुबह की जंग का आधा फ़ैसला रात में हो जाता है. सोने से पहले के पंद्रह मिनट में कल की सुबह तैयार कीजिए: बच्चे के और अपने कपड़े निकले हुए, स्कूल-बैग भरा, बोतलें धुली, नाश्ते की योजना तय (सोच नहीं — तय). सुबह का हर छोटा फ़ैसला — 'क्या पहनाऊँ, क्या बनाऊँ' — थकी हुई बैटरी से ही कटता है; रात का पंद्रह मिनट सुबह का आधा घंटा और आधा ग़ुस्सा बचाता है.

अपनी नींद को भी उतनी ही गंभीरता से लीजिए जितनी बच्चे की: सोने का समय तय, सोने से पहले का आधा घंटा फ़ोन-मुक्त (रील्स की क़ीमत सुबह चुकानी पड़ती है), और कैफ़ीन दोपहर तीन के बाद बंद. रात में बच्चा जगाता है — वह आपके हाथ में नहीं; अपने हाथ की नींद तो पूरी लीजिए.

और हो सके तो रात की ड्यूटी बाँटिए: एक रात/एक हिस्सा पापा का (निकाला दूध हो तो रात की एक फीड भी), सप्ताहांत की एक सुबह पूरी तरह आपकी नींद की. यह विलासिता नहीं — जिस घर में माँ अकेली रात सँभालती है, वहाँ सुबह की थकान किसी तरकीब से नहीं जाती.

उठते ही के दस मिनट: शरीर को चालू करने का तरीक़ा

आँख खुलते ही फ़ोन नहीं — यह सुबह का सबसे सस्ता सुधार है. बिस्तर में स्क्रॉल के दस मिनट न ऊर्जा देते हैं न समय; बदले में वही दस मिनट शरीर को दीजिए: उठकर सबसे पहले एक-दो गिलास पानी (रात भर का शरीर प्यासा है — थकान का एक हिस्सा सिर्फ़ प्यास है), फिर खिड़की-बालकनी की रोशनी में एक मिनट.

सुबह की रोशनी शरीर की घड़ी का सबसे ताक़तवर बटन है — आँखों में दिन की रोशनी पड़ते ही नींद का हार्मोन थमता है और शरीर 'दिन' पर सेट होता है. मौक़ा लगे तो चाय-कॉफ़ी बालकनी-आँगन में पीजिए; बच्चे के साथ ही सही.

फिर दो मिनट की हलचल: दस जंपिंग-जैक, सीढ़ियों के दो चक्कर, या बच्चे को उठाकर एक गाना-नाच. मक़सद कसरत नहीं, ख़ून का दौड़ना है — दो मिनट की हलचल आधे घंटे की सुस्ती काटती है. नहाने के आख़िर में बीस सेकंड ठंडा पानी झेल सकें तो वह भी जगाने का पक्का बटन है.

नाश्ता: अपना भी, सिर्फ़ बच्चों का नहीं

माँओं की सुबह की सबसे आम ग़लती: सबको खिलाकर ख़ुद सिर्फ़ चाय. ख़ाली पेट + कैफ़ीन = ग्यारह बजे की गिरती बैटरी और चिड़चिड़ाहट. अपना नाश्ता बच्चों जितना ही ज़रूरी मानिए, और उसमें प्रोटीन ज़रूर हो — प्रोटीन ही वह चीज़ है जो देर तक टिकती है: अंडा, दही, पोहे-उपमा में मूँगफली, बेसन-मूँग का चीला, दूध-छाछ, भीगे बादाम.

समय नहीं मिलता — तो नाश्ता भी रात में बनाइए: भीगा हुआ ओट्स (दूध-दही में भिगोकर फ़्रिज में, सुबह फल डालकर), उबले अंडे, कटा फल, रात का बचा चीला-पराठा. 'दो मिनट में उठाकर खाने लायक़' कुछ न कुछ फ़्रिज में हमेशा रहे — वरना उठाकर खाने लायक़ सिर्फ़ बिस्किट मिलेगा.

पानी दिन भर चलता रहे — बोतल भरकर रसोई-काम की जगह पर रखिए. और चाय-कॉफ़ी से रिश्ता समझदारी का: पहली प्याली नाश्ते के साथ (ख़ाली पेट नहीं), दिन में दो-तीन तक, स्तनपान करा रही हैं तो भी इतना आम तौर पर ठीक है — तीसरे पहर के बाद बंद, ताकि रात की नींद जो मिले, गहरी मिले.

सुबह की लय: भागदौड़ को क्रम में बदलिए

जो सुबह हर दिन नई लड़ाई लगती है, उसे क्रम (routine) पुरानी और शांत कर देता है — बच्चों के लिए भी, आपके लिए भी. हर काम का एक तय क्रम: उठना-ब्रश-कपड़े-नाश्ता-जूते — रोज़ वही क्रम, तो बच्चा अगली चीज़ खुद जानता है और हर क़दम की रस्साकशी घटती है. छोटे बच्चे के लिए क्रम की तस्वीरें दीवार पर (ब्रश-कपड़े-नाश्ते के चित्र) कमाल करती हैं.

घड़ी से पाँच-दस मिनट की चोरी भी आज़माइए: बच्चों से पहले उठे पंद्रह मिनट — चुपचाप चाय, साँस, या सिर्फ़ ख़ामोशी — कई माँओं के लिए दिन का सबसे क़ीमती हिस्सा होते हैं. पर यह तरकीब उन्हीं के लिए है जिनकी रात ठीक कटी हो: रात में तीन बार जगी माँ के लिए वही पंद्रह मिनट नींद ज़्यादा क़ीमती है. अपनी रात देखकर चुनिए — यह भी समझदारी है, हार नहीं.

और सुबह के काम बाँटिए — उम्र से नहीं, सूची से: पापा के नाम के तय काम (टिफ़िन/नाश्ता/स्कूल छोड़ना — कुछ भी, पर तय और रोज़), और बच्चों के भी: तीन साल वाला अपने जूते लाता है, पाँच साल वाला अपनी बोतल भरता है. धीमे होंगे, ग़लत होंगे — पर बँटा हुआ धीमा काम, अकेले तेज़ काम से सस्ता पड़ता है.

जब थकान तरकीबों से बड़ी लगे

कुछ थकान नींद की नहीं, शरीर या मन की होती है — और वह सुबह की तरकीबों से नहीं जाती. डॉक्टर से जाँच की बात कीजिए अगर: भरपूर सोकर भी हफ़्तों से थकान वैसी ही है (भारतीय महिलाओं में आयरन की कमी और थायरॉइड थकान के सबसे आम छिपे कारण हैं — दोनों की जाँच सीधी है), साँस चढ़ती है, बाल बहुत झड़ रहे हैं, या ठंड-गर्मी असामान्य लग रही है.

और मन की जाँच भी उतनी ही ज़रूरी: सुबह उठते ही बोझ-उदासी, किसी चीज़ में मन नहीं, चिड़चिड़ाहट-आँसू-अपराधबोध का घेरा — डिलीवरी के बाद के पहले साल में यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है, और वह इच्छाशक्ति की नहीं, इलाज की चीज़ है. हमारी नई माँ की सेल्फ़-केयर वाली गाइड में इसके निशान और मदद के रास्ते हैं — और पहला क़दम किसी एक आदमी से सच बोलना है: 'मैं ठीक नहीं हूँ.'

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: रात में बच्चा तीन-चार बार उठता है — कोई भी तरकीब सुबह कैसे बचाएगी? — सच यही है: उस दौर में सुबह 'अच्छी' नहीं, 'निभाई हुई' होती है — और यह दौर है, हमेशा नहीं. उन महीनों में तरकीबों की सूची छोटी कर लीजिए: पानी, रोशनी, नाश्ता — बस. बाक़ी सारी ऊर्जा नींद बटोरने में: बच्चे की झपकी में एक झपकी आपकी (घर का काम नहीं), रात की एक ड्यूटी किसी और की, और मेहमान-रस्में कम.

सवाल: सुबह उठते ही चिड़चिड़ाहट बच्चों पर निकल जाती है, फिर दिन भर अपराधबोध. — पहला क़दम: इसे चरित्र की कमी नहीं, ईंधन की कमी पढ़िए — भूखी-प्यासी-अधसोई माँ का चिड़चिड़ाना शरीर का संकेत है. ऊपर की तरकीबें (पानी, नाश्ता, रात की तैयारी) ईंधन का इलाज हैं. फट पड़ें तो मरम्मत सीधी है: 'मम्मी ग़ुस्से में बोली, माफ़ करना' — बच्चे माफ़ी से नहीं, माफ़ी न मिलने से टूटते हैं. रोज़-रोज़ हो और अपराधबोध भारी हो, तो पिछले हिस्से वाली मन की जाँच पढ़िए.

सवाल: कामकाजी माँ हूँ — सुबह घर+तैयारी+ऑफ़िस, सब एक साथ कैसे? — कामकाजी सुबह का असली इलाज घटाना है, जोड़ना नहीं: हफ़्ते के कपड़े रविवार को तय, नाश्ते का हफ़्ते का मेन्यू लिखा हुआ (सोचना ख़त्म), टिफ़िन की तैयारी रात में, और सुबह का हर वह काम जो कोई और कर सकता है — करता कोई और ही है. दफ़्तर पहुँचकर पाँच मिनट साँस लेने का हक़ अपने कैलेंडर में रखिए — मीटिंग की तरह.

सवाल: एनर्जी ड्रिंक या मल्टीविटामिन से मदद मिलेगी? — एनर्जी ड्रिंक नहीं — वे कैफ़ीन-चीनी का उधार हैं जो दोपहर में ब्याज समेत वसूलते हैं, और स्तनपान में तो सोच-समझकर भी नहीं. मल्टीविटामिन 'शायद' नहीं, जाँच के बाद: थकान लंबी हो तो डॉक्टर से हीमोग्लोबिन-थायरॉइड-विटामिन D की जाँच कराइए और कमी निकले वही चीज़ लीजिए. अंधाधुंध गोलियों से बेहतर वही पुराने तीन: खाना, पानी, नींद.

Mum wellbeingEnergyRoutine

समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम