
बड़ों की रोड ट्रिप किलोमीटर में मापी जाती है, बच्चों की — रुकावटों में. तीन नियम सफ़र को लड़ाई से छुट्टी में बदल देते हैं: बच्चे की घड़ी से चलिए, पेट भरा रखिए, और ऊब का इंतज़ाम पहले से कीजिए.
गूगल छह घंटे कहता है, तो बच्चों के साथ आठ मानकर चलिए. हर डेढ़-दो घंटे पर एक रुकावट — पैर फैलाने, शौचालय, दस मिनट दौड़ने की — यह विलासिता नहीं, सफ़र का हिस्सा है. जो परिवार रुकने का समय पहले से जोड़कर चलता है, वह रास्ते भर 'कितनी देर और?' से नहीं लड़ता.
चलने का समय बच्चे की नींद से जोड़िए. सबसे आसान चालें दो हैं: भोर की — सुबह चार-पाँच बजे निकलिए, बच्चा सोता हुआ गाड़ी में आ जाए और पहले तीन घंटे नींद में कट जाएँ; या दोपहर की — खाना खिलाकर झपकी के समय निकलिए. दोनों में पहला लंबा हिस्सा शांति से निकलता है.
आख़िरी घंटा सबसे कठिन होता है — बच्चा भी थका, आप भी. मंज़िल से पहले की आख़िरी रुकावट को छोटा-मीठा बनाइए: कुछ ठंडा, दस मिनट खुली हवा. और पहुँचने का समय ऐसा रखिए कि पहुँचकर सीधे सोने की जंग न लड़नी पड़े.
एक बात और: रात की ड्राइविंग बच्चों की नींद के लिए अच्छी लगती है, पर हाईवे पर रात का जोखिम — थकी आँखें, ट्रक, रोशनी की कमी — इस सुविधा से बड़ा है. जहाँ तक हो, दिन में चलिए.
कार में मचा आधा हंगामा असल में भूख है. घर से निकलते समय पेट भरा हो और हाथ में हर घंटे कुछ न कुछ पहुँचता रहे — तो सफ़र का सबसे बड़ा दुश्मन वहीं ख़त्म हो जाता है.
साथ रखने की चीज़ें वे जो गिरें तो सीट ख़राब न करें: केला, सेब के टुकड़े, भुना चना, मखाना, सूखा पोहा-चिवड़ा, पराठा रोल, इडली, मठरी, खाखरा. चॉकलेट और चिप्स दिखाकर मत रखिए — जो दिखता है, वही माँगा जाता है. गर्मी में मिल्क-बेस्ड चीज़ें (मिठाई, खोया) साथ मत लीजिए — बिगड़ जाती हैं.
पानी अपना, हर सीट पर एक बोतल. प्यास और 'सूसू आ रही है' का संतुलन हर माता-पिता जानते हैं — घूँट-घूँट पिलाते चलिए, रुकावट से ठीक पहले ज़्यादा. ढाबे-रेस्तरां पर बच्चों को वही खिलाइए जो गर्म बना हो और चल रहा हो; सलाद, चटनी और खुले पानी से रास्ते के पेट ख़राब होते हैं.
उल्टी (motion sickness) वाले बच्चे के लिए: खाली पेट नहीं, ठूँसा पेट भी नहीं; आगे की सड़क दिखे ऐसी बैठक; किताब-मोबाइल बंद, खिड़की से बाहर देखना चालू; और अदरक या इलायची चूसने को. दवा देनी हो तो डॉक्टर से पहले पूछकर, सफ़र से पहले वाली रात नहीं — निकलने से आधा घंटा पहले.
स्क्रीन को आख़िरी हथियार बनाइए, पहला नहीं. पहला घंटा खिड़की का है — गाड़ियाँ गिनना, रंग खोजना ('लाल ट्रक किसे पहले दिखेगा?'), अंताक्षरी, कहानी. जब खेल-गीत-कहानी चुक जाएँ, तब स्क्रीन निकालिए — तब वह जादू की तरह काम करती है. पहले घंटे से चली स्क्रीन चौथे घंटे तक अपना असर खो चुकी होती है.
एक 'सरप्राइज़ बैग' बनाइए: तीन-चार छोटी चीज़ें जो बच्चे ने पहले नहीं देखीं — नई स्टिकर बुक, छोटी गाड़ी, मैग्नेट वाली ड्रॉइंग स्लेट, विंडो पर चिपकने वाले जेल स्टिकर. हर डेढ़-दो घंटे पर एक चीज़ निकलती है. नयापन ऊब की सबसे सस्ती दवा है.
आवाज़ का इंतज़ाम भी कीजिए: बच्चों के गीत, कहानियों की ऑडियो — पहले से डाउनलोड करके, क्योंकि हाईवे पर नेटवर्क वादा नहीं करता. एक ही राइम बीसवीं बार सुनना आपके धैर्य की परीक्षा है, पर सफ़र की शांति उससे सस्ती नहीं मिलती.
और थोड़ी ऊब रह जाए तो रह जाने दीजिए. खिड़की से बाहर ताकता, अपने आप कहानी बुनता बच्चा कुछ ग़लत नहीं कर रहा — ऊब से ही खेल पैदा होता है.
चार साल से छोटा बच्चा चाइल्ड कार सीट में — हर बार, हर दूरी पर. गोद सीट-बेल्ट नहीं है: टक्कर के पल गोद के हाथ बच्चे को नहीं रोक पाते. कार सीट पीछे की सीट पर लगे, और जब तक कंधे-कूल्हे की पट्टियाँ ठीक बैठें, बच्चा उसी में. बड़े बच्चे के लिए बूस्टर, और सीट बेल्ट सबकी — पीछे बैठने वालों की भी.
चाइल्ड लॉक चालू, खिड़कियों का लॉक ड्राइवर के हाथ में. चलती गाड़ी में सिर-हाथ बाहर — इस पर पहली बार में ही सख़्ती, हँसी नहीं.
गर्मी की सबसे ज़रूरी बात: बच्चे को खड़ी गाड़ी में अकेला कभी नहीं छोड़ना — एक मिनट के लिए भी नहीं. बंद गाड़ी धूप में मिनटों में भट्टी बनती है. रुके, तो बच्चा साथ उतरेगा — नियम इतना ही सीधा है.
गाड़ी की तैयारी भी सुरक्षा है: टायर-ब्रेक-वाइपर की जाँच, स्टेपनी और टूल-किट, फ़र्स्ट-एड बॉक्स (पैरासिटामोल, ORS, पट्टी, बच्चे की चल रही दवाएँ), टॉर्च और चार्जर. और घर पर किसी को अपना रूट और पहुँचने का अंदाज़न समय बताकर चलिए.
डिक्की में सब कुछ हो सकता है, पर एक बैग आगे रहेगा — इसमें: वाइप्स, टिश्यू, सैनिटाइज़र, एक जोड़ी कपड़े (उल्टी और छलकने के लिए), प्लास्टिक की दो थैलियाँ (गंदे कपड़े, कचरा), पानी, नाश्ता, बच्चे की दवाएँ, और सरप्राइज़ बैग. जो चीज़ चलती गाड़ी में चाहिए होगी, वह डिक्की में होना = हाईवे पर रुकना.
डायपर वाले बच्चे के साथ: सफ़र के हर तीन घंटे पर एक डायपर + दो अतिरिक्त, चेंजिंग मैट, और गंदे डायपर के लिए ज़िप वाली थैली. रास्ते के शौचालयों पर भरोसा कम रखिए — कई बार गाड़ी की पिछली सीट ही सबसे साफ़ विकल्प है.
छोटे बच्चे का अपना तकिया-कंबल या जानी-पहचानी चादर साथ लीजिए — गाड़ी में नींद और होटल की पहली रात, दोनों आसान हो जाते हैं. धूप वाली तरफ़ खिड़की पर सन-शेड, और सूरज की दिशा देखकर बैठक बदलने में संकोच मत कीजिए.
सवाल: कितने महीने के बच्चे के साथ रोड ट्रिप ठीक है? — छोटी दूरी (दो-तीन घंटे) पहले महीनों से भी हो जाती है, बशर्ते कार सीट हो और हर डेढ़ घंटे पर रुकें. लंबी ट्रिप छह महीने के बाद आसान होती है, जब गर्दन सधी है और खाना-सोना कुछ तय हुआ है. नवजात के साथ लंबा सफ़र टालना ही बेहतर.
सवाल: बच्चा कार सीट में बैठने से रोता है, हर बार जंग होती है. — घर में खड़ी गाड़ी में बैठने का अभ्यास कराइए, सीट में बैठते ही मिलने वाला एक ख़ास खिलौना रखिए जो और कभी नहीं मिलता, और रोने पर गाड़ी रोककर इंतज़ार कीजिए — 'गाड़ी तभी चलती है जब बेल्ट बंधी हो' नियम बन जाए तो जंग कुछ हफ़्तों में ख़त्म होती है. गोद में लेकर 'बस आज' — यही एक चीज़ कभी मत कीजिए.
सवाल: सफ़र में बच्चे को कितनी स्क्रीन ठीक है? — रोज़ के नियम सफ़र पर कुछ ढील पा सकते हैं — यह हार नहीं, समझदारी है. कोशिश इतनी कीजिए कि स्क्रीन तीसरा-चौथा सहारा हो, पहला नहीं, और हर घंटे आँखों को खिड़की से बाहर की छुट्टी मिले. लौटकर घर के नियम फिर लागू.
सवाल: बच्चे को कार में उल्टी हो जाए तो? — पहले बच्चा: साफ़ कीजिए, कपड़े बदलिए, कुल्ला कराइए, थोड़ा पानी घूँट-घूँट. फिर गाड़ी: इसीलिए वाइप्स, थैली और कपड़े आगे की सीट पर थे. दस मिनट खुली हवा में बैठकर ही आगे बढ़िए, और आगे का रास्ता खिड़की से बाहर देखते हुए. बार-बार हो तो अगली ट्रिप से पहले डॉक्टर से बात कीजिए.
सवाल: अकेले (एक ही बड़ा) बच्चे के साथ लंबी ड्राइव — कोई ख़ास सलाह? — रुकावटें ज़्यादा रखिए, क्योंकि पीछे मुड़कर सँभालने वाला कोई नहीं है. हर चीज़ — पानी, नाश्ता, खिलौना — बच्चे की पहुँच में रखकर चलिए. और अपनी थकान को सफ़र का हिस्सा मानिए: नींद की एक झपकी का जोखिम हर देरी से महँगा है. थकें, तो रुकिए.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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