खेल और गतिविधियां

पार्क और प्लेग्राउंड की आम समस्याएँ — धक्का, झगड़ा, झूले की लाइन — और उनके आसान हल

खेल और गतिविधियां · theAsianparent · अपडेट किया गया

Google पर पसंदीदा
पार्क और प्लेग्राउंड की आम समस्याएँ — धक्का, झगड़ा, झूले की लाइन — और उनके आसान हल

शाम के पार्क में आधा समय खेल चलता है और आधा समय झगड़े. कौन-सी परेशानी में तुरंत बीच में पड़ना है, कौन-सी बच्चों को खुद सुलझाने देनी है — यह लेख वही फ़र्क़ सिखाता है.

पार्क की परेशानियाँ असल में पाठशाला हैं

शाम को सोसाइटी के पार्क या मोहल्ले के मैदान में जो होता है, वह सिर्फ़ खेल नहीं है. झूले की लाइन में खड़ा होना, अपनी बारी का इंतज़ार, हारकर भी दोबारा खेलना, अनजान बच्चे से दोस्ती — ये सब वे हुनर हैं जो किताब से नहीं आते. इसलिए पार्क की हर समस्या को 'परेशानी' मानकर तुरंत मिटाने की ज़रूरत नहीं — कुछ समस्याएँ ही असली सबक़ हैं.

फिर भी हर शाम कुछ स्थितियाँ बार-बार लौटती हैं: कोई बच्चा धक्का देता है, कोई खिलौना छीनता है, कोई झूले से उतरता ही नहीं, और कोई किनारे अकेला खड़ा रहता है. इनमें से हर एक का तरीक़ा अलग है, और सबसे पहले यह तय करना होता है कि यह बच्चों के सुलझाने की बात है या बड़ों के बीच में आने की.

एक सीधा नियम याद रखिए: चोट का ख़तरा हो, बार-बार वही बच्चा निशाना बन रहा हो, या उम्र का फ़ासला बड़ा हो — तो बड़े बीच में आएँ. बाक़ी हालात में पास खड़े रहकर देखना ही सबसे अच्छी मदद है. बच्चे जो झगड़ा खुद सुलझा लेते हैं, वह सीख जीवन भर चलती है.

धक्का देना और मारना: उसी पल क्या करें

आपका बच्चा किसी को धक्का दे — तो सबसे पहला काम है खेल से बाहर निकालना. डाँट भाषण नहीं, एक छोटा वाक्य: 'धक्का नहीं. इससे चोट लगती है.' फिर कुछ मिनट किनारे बैठाइए. लंबा भाषण तीन-चार साल के बच्चे के ऊपर से निकल जाता है; छोटा वाक्य और खेल से छोटा ब्रेक याद रहता है.

सामने वाले बच्चे और उसके माता-पिता से आप ही माफ़ी कहिए — बच्चे को 'sorry बोलो' के लिए ज़बरदस्ती घसीटने से रटी हुई sorry आती है, शर्मिंदगी सीख नहीं. उसकी जगह घर लौटकर पूछिए: 'धक्का क्यों दिया था? अगली बार शब्दों से क्या कह सकते हो?' यही असली अभ्यास है.

और आपके बच्चे को धक्का लगे — तो पहले अपने बच्चे को देखिए, दूसरे बच्चे को डाँटने मत दौड़िए. 'तुम ठीक हो? डर लगा?' — इतना काफ़ी है. दूसरे बच्चे को सुधारना उसके माता-पिता का काम है; ज़रूरत लगे तो उनसे शांति से बात कीजिए, बच्चे से नहीं.

बार-बार मारने वाला बच्चा अक्सर थका, भूखा या शब्दों में पीछे होता है — शरारती नहीं. पार्क जाने का समय बदलकर, जाने से पहले कुछ खिलाकर, और 'मुझे भी चाहिए' जैसे वाक्य सिखाकर आधे धक्के वैसे ही ख़त्म हो जाते हैं.

झूले की लाइन और बारी का इंतज़ार

झूला हर पार्क का सबसे बड़ा झगड़ा है — एक झूला, दस बच्चे. गिनती सबसे आसान हल है: 'बीस झूले और, फिर अगली बारी.' गिनती बच्चों को निष्पक्ष लगती है क्योंकि वह किसी बड़े की मर्ज़ी नहीं, नियम है. अपने बच्चे के साथ आप ही ज़ोर से गिनिए — बाक़ी बच्चे अपने आप जुड़ जाते हैं.

आपका बच्चा उतरने से मना करे तो विकल्प दीजिए, धमकी नहीं: 'दस और गिनकर खुद उतरोगे, या मैं उतारूँ?' ज़्यादातर बच्चे पहला विकल्प चुनते हैं क्योंकि उसमें इज़्ज़त बची रहती है.

इंतज़ार करना ख़ुद में सिखाने की चीज़ है. लाइन में खड़े-खड़े ऊबता बच्चा झगड़ा करता है — इसलिए इंतज़ार को खेल बनाइए: 'जब तक बारी आए, दस पत्ते गिनो', 'उस पेड़ तक दौड़कर आओ.' ऊब गया इंतज़ार लंबा लगता है, व्यस्त इंतज़ार छोटा.

खिलौना छीनना — अपना भी, दूसरों का भी

पार्क में ले जाया गया खिलौना सार्वजनिक संपत्ति बन जाता है — यह बात घर से निकलने से पहले तय कर लीजिए. 'यह गाड़ी पार्क ले जाओगे तो दूसरे बच्चे भी माँगेंगे. देना पड़ेगा या घर छोड़ना है?' बच्चे को पहले से चुनने दीजिए. सबसे प्यारा खिलौना घर छोड़ना ही समझदारी है.

आपका बच्चा किसी का खिलौना छीने — तो वापस कराइए, हर बार, बिना अपवाद. 'पहले पूछो — क्या मैं ले सकता हूँ?' यह वाक्य जितनी बार दोहराया जाए, उतनी जल्दी आदत बनता है. और सामने वाला बच्चा मना कर दे, तो वह भी सबक़ है: हर माँग पूरी नहीं होती.

छीना-झपटी दो-तीन साल की उम्र में सामान्य विकास है, बदतमीज़ी नहीं. इस उम्र का दिमाग़ 'मेरा' समझता है, 'तुम्हारा' अभी सीख रहा है. चार-पाँच साल तक बारी और अदला-बदली अपने आप बेहतर होती है — बशर्ते बड़े हर बार ठीक वाक्य दोहराते रहें.

किनारे खड़ा बच्चा: शर्मीलेपन की सही मदद

हर पार्क में एक बच्चा किनारे खड़ा देखता रहता है. उसे धकेलना — 'जाओ, खेलो न!' — उल्टा पड़ता है. शर्मीले बच्चे को देखने का समय चाहिए; वह पहले आँखों से खेलता है, फिर पैरों से. दस मिनट देखना उसकी तैयारी है, समय की बर्बादी नहीं.

मदद करनी हो तो पुल बनिए, धक्का नहीं: 'वह बच्चा भी रेत में खुदाई कर रहा है — तुम्हारे पास फावड़ा है, दिखाओगे?' एक साझा चीज़ — बॉल, बाल्टी, चॉक — दो अनजान बच्चों की सबसे तेज़ दोस्ती कराती है.

रोज़ एक ही समय पर पार्क जाना भी मदद है. वही जाने-पहचाने चेहरे रोज़ दिखें तो शर्मीला बच्चा हफ़्ते भर में घुल जाता है. रोज़ नई जगह, नए बच्चे — यह मिलनसार बच्चों का खेल है.

बड़े बच्चों के बीच छोटा बच्चा

शाम के पार्क में तीन साल वाले और दस साल वाले एक ही मैदान में होते हैं, और यही चोटों का सबसे बड़ा कारण है. छोटे बच्चे को दौड़ते-भागते बड़े बच्चों के क्रिकेट या पकड़म-पकड़ाई के बीच से हटाकर छोटे बच्चों वाले कोने में रखना आपकी ज़िम्मेदारी है — बड़े बच्चों की नहीं.

बड़ा भाई-बहन साथ हो तो उसे 'छोटे का ध्यान रखो' की ड्यूटी हर रोज़ मत दीजिए. उसका भी खेल का हक़ है. कुछ दिन ज़िम्मेदारी, कुछ दिन आज़ादी — दोनों का संतुलन रखिए.

और झगड़ा दो परिवारों की बात बन जाए — आवाज़ें ऊँची होने लगें — तो बच्चों को वहाँ से हटा लीजिए. बड़ों की लड़ाई देखना बच्चे के लिए किसी भी धक्के से ज़्यादा नुक़सानदेह है.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: मेरा बच्चा रोज़ पिटकर आता है, पर कुछ कहता नहीं. क्या करूँ? — कुछ दिन खुद पार्क में पास रहकर देखिए कि हो क्या रहा है. फिर बच्चे को दो वाक्य सिखाइए: ज़ोर से 'नहीं! मत करो!' कहना, और वहाँ से हटकर बड़े को बताना. वापस मारना मत सिखाइए — उससे झगड़ा बढ़ता है, रुकता नहीं.

सवाल: दूसरे बच्चे के माता-पिता से शिकायत करना ठीक है? — हाँ, अगर बात बार-बार की है और लहजा शांत हो. 'आपका बेटा और मेरा बेटा रोज़ भिड़ रहे हैं, मिलकर देखें?' — यह शिकायत नहीं, साझेदारी है. भरे पार्क में डाँट-डपट से बात कभी नहीं बनती.

सवाल: बच्चा हारते ही खेल छोड़कर रोने लगता है. — घर में जान-बूझकर कभी जीतिए, कभी हराइए, और हारने पर खुद बोलकर दिखाइए: 'ओह, मैं हार गया! चलो, एक बार और.' हारना सहने की ताक़त देखकर सीखी जाती है, कहने से नहीं.

सवाल: किस उम्र में बच्चे को अकेले पार्क भेजा जा सकता है? — इसका जवाब उम्र से ज़्यादा पार्क पर है: घर से दिखता है या नहीं, सड़क पार करनी है या नहीं, वहाँ जाने-पहचाने लोग हैं या नहीं. ज़्यादातर परिवार छह-सात साल से सोसाइटी के अंदर के पार्क में नज़र रखते हुए छोड़ना शुरू करते हैं — पर यह फ़ैसला हर परिवार का अपना है.

सवाल: पार्क में मोबाइल देखना कितना ग़लत है? — नज़र उठाकर देखते रहिए, यही असली बात है. छोटे बच्चे (पाँच साल से कम) के साथ फ़ोन जेब में ही भला — इस उम्र में चोटें सेकंडों में लगती हैं, और स्लाइड के ऊपर से 'पापा, देखो!' का जवाब न मिलना भी अपनी तरह की चोट है.

PlayBehaviourToddler

समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम