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विशेष ज़रूरतों वाले शिशु को स्तनपान: धैर्य, तरीक़े और मदद की पूरी गाइड

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विशेष ज़रूरतों वाले शिशु को स्तनपान: धैर्य, तरीक़े और मदद की पूरी गाइड

जिस बच्चे को दूध पीने में मेहनत ज़्यादा लगती है, उसके लिए माँ का दूध और भी क़ीमती है — और रास्ते हर हाल में निकलते हैं: कभी सीधी छाती से, कभी निकालकर, कभी दोनों मिलाकर. यह गाइड हर स्थिति का व्यावहारिक रास्ता दिखाती है.

पहली बात: दूध की हर बूँद गिनती है

विशेष ज़रूरतों वाले शिशु की माँ को सबसे पहले यह सुनना चाहिए: स्तनपान सब-या-कुछ-नहीं का सौदा नहीं है. सीधे छाती से पूरा दूध सबसे अच्छी तस्वीर है, पर निकालकर कटोरी-चम्मच से दिया दूध, ट्यूब से दिया दूध, या फ़ॉर्मूला के साथ मिला-जुला दूध — ये सब भी जीत हैं. जो बच्चा ज़्यादा मेहनत से पीता है, उसके लिए माँ के दूध की सुरक्षा — संक्रमण से बचाव, पचने में आसानी — और भी क़ीमती है.

दूसरी बात: मदद माँगना इस सफ़र का हिस्सा है, विकल्प नहीं. अस्पताल की नर्स, लैक्टेशन सलाहकार, बाल-रोग विशेषज्ञ — हर पड़ाव पर इनसे पूछिए. भारत के बड़े अस्पतालों में अब लैक्टेशन क्लीनिक हैं, और सरकारी अस्पतालों के SNCU/NICU में भी दूध निकालने-पिलाने की ट्रेनिंग मिलती है.

और तीसरी: अपनी थकान का हिसाब रखिए. जिस फीडिंग में सामान्य से दुगनी मेहनत है, उसमें माँ का खाना-पानी-नींद-आँसू सबकी जगह है. मदद बाँटिए — निकाला दूध पापा भी पिला सकते हैं.

समय से पहले जन्मा (premature) शिशु

प्रीमैच्योर बच्चे की चूसने-निगलने-साँस की जोड़ी क़रीब 34 हफ़्ते की उम्र तक पकती है, इसलिए शुरुआती हफ़्तों में सीधी छाती की जगह निकाला दूध — ट्यूब, कटोरी (paladai) या चम्मच से — देना सामान्य है. आपका काम इन हफ़्तों में दो है: दूध की सप्लाई खड़ी करना और बच्चे से त्वचा का रिश्ता बनाना.

सप्लाई के लिए: जन्म के पहले घंटों से ही हाथ से या पंप से दूध निकालना शुरू कीजिए और दिन-रात मिलाकर आठ या उससे ज़्यादा बार निकालिए — शुरुआती बूँदें (कोलोस्ट्रम) कम दिखती हैं पर सोने से महँगी हैं. रात का एक सत्र सप्लाई के लिए सबसे असरदार है.

कंगारू मदर केयर (KMC) — बच्चे को छाती से त्वचा-से-त्वचा चिपकाकर रखना — भारत के NICU में बाक़ायदा इलाज का हिस्सा है: यह बच्चे का वज़न, तापमान और साँस सुधारता है और माँ का दूध बढ़ाता है. जितने घंटे मिलें, लीजिए.

छाती से सीधा पीना शुरू होगा तो धीरे — पहले चाटना-सूँघना, फिर छोटे सत्र. निप्पल शील्ड कई प्रीमैच्योर बच्चों के लिए पुल का काम करती है; लैक्टेशन सलाहकार से लगवाना सीखिए. वज़न की तसल्ली नियमित तौल से आएगी, अंदाज़े से नहीं.

डाउन सिंड्रोम और कमज़ोर मांसपेशी-टोन वाला शिशु

डाउन सिंड्रोम वाले कई शिशुओं में मांसपेशियों की ढिलाई (कम टोन) चूसने की पकड़ को कमज़ोर और थकान को जल्दी बनाती है — पर इनमें से ज़्यादातर बच्चे स्तनपान कर सकते हैं; समय और तरीक़ा ज़्यादा लगता है, बस.

काम की तरकीबें: बच्चे को अच्छी तरह सहारा देकर पिलाइए — dancer hold (हाथ से बच्चे की ठुड्डी-गालों को C-आकार में सहारा) पकड़ को टिकाती है; छोटे-छोटे, बार-बार सत्र रखिए क्योंकि लंबा सत्र थका देता है; और सोते-ऊँघते बच्चे को कपड़े ढीले कर, पैर गुदगुदाकर, दूध की बूँद होंठ पर लगाकर जगाते चलिए.

फीड के बाद निकाला दूध ऊपर से देना (top-up) और सप्लाई के लिए पंपिंग जोड़ना — जब तक बच्चे की ताक़त बढ़े — आम और समझदार रास्ता है. दिल की जुड़ी तकलीफ़ हो (डाउन सिंड्रोम में आम है) तो नीचे दिल वाला हिस्सा भी पढ़िए.

इन बच्चों में जीभ का बाहर रहना, और आगे चलकर ठोस खाने में देरी, सामान्य है — फीडिंग-थेरेपिस्ट/स्पीच थेरेपिस्ट की एक सलाह शुरू में ही ले लेना पूरे सफ़र को आसान करता है.

कटे होंठ-तालू (cleft lip/palate) वाला शिशु

सिर्फ़ होंठ कटा हो (तालू पूरा हो) तो स्तनपान अक्सर हो जाता है — स्तन का नरम ऊतक कट को ख़ुद भर देता है; कटे हिस्से को ऊपर की ओर रखने वाली स्थिति आज़माइए.

तालू कटा हो तो बच्चा मुँह में दूध खींचने का दबाव (suction) नहीं बना पाता — यह माँ की या बच्चे की मेहनत की कमी नहीं, बनावट की बात है. ऐसे में दूध पिलाने के ख़ास तरीक़े काम आते हैं: सीधा-बैठा रुख़ (दूध नाक की ओर न जाए), विशेष बोतलें जो दबाने से दूध देती हैं (squeezable/विशेष निप्पल), और निकाला हुआ माँ का दूध ही इन बोतलों से.

हर फीड में समय ज़्यादा लगेगा और डकार ज़्यादा आएगी (हवा ज़्यादा जाती है) — बीच-बीच में डकार दिलाते चलिए. वज़न की नियमित तौल यहाँ भी तसल्ली का पैमाना है.

भारत में cleft की सर्जरी आम तौर पर पहले साल में हो जाती है (होंठ पहले, तालू बाद में) और कई संस्थाएँ यह मुफ़्त कराती हैं — अपने अस्पताल से cleft टीम/योजनाओं के बारे में ज़रूर पूछिए. सर्जरी के बाद दूध पिलाने के नियम सर्जन तय करेंगे.

दिल की तकलीफ़, बीमार बच्चा और अस्पताल के दौर

जन्मजात दिल की तकलीफ़ वाले शिशु के लिए दूध पीना कसरत है — वह जल्दी थकता है, पसीना आता है, साँस फूलती है. तरकीबें वही हैं जो कमज़ोर टोन में: छोटे-बार-बार सत्र, बीच में आराम, सहारे वाली पकड़, और ज़रूरत पर निकाले दूध का top-up. कुछ बच्चों को कैलोरी बढ़ाकर (डॉक्टर की सलाह पर fortification) दूध दिया जाता है — यह माँ के दूध की नाकामी नहीं, दिल की माँग है.

अस्पताल में भर्ती के दौर में — सर्जरी, संक्रमण, फोटोथेरेपी — स्तनपान अक्सर टूटता है. उस दौर का मंत्र: पंपिंग की लय मत टूटने दीजिए (हर तीन घंटे में, रात समेत), दूध लेबल करके NICU को दीजिए, और जैसे ही डॉक्टर हाँ कहें, छाती पर वापसी कीजिए. हफ़्तों के ब्रेक के बाद भी बच्चे छाती पर लौटते हैं — यह रोज़ होता है.

ट्यूब या कटोरी से दूध पीता बच्चा 'बोतल की आदत' का शिकार नहीं होता — बल्कि कटोरी-चम्मच (paladai) भारत के NICU में इसीलिए पसंद किए जाते हैं कि छाती की ओर लौटना आसान रहे.

डॉक्टर को कब दिखाएँ

उसी दिन दिखाइए: फीड के दौरान होंठ-चेहरे का नीला पड़ना या साँस रुकना, हर फीड पर उल्टी-सी थकान और पसीना, 24 घंटे में छह से कम गीले डायपर, फीड से लगातार इनकार, बुख़ार, या असामान्य सुस्ती जिसमें बच्चा फीड के लिए भी न जागे.

जल्दी सलाह लीजिए: वज़न न बढ़ना या गिरना (तौल का चार्ट साथ रखिए), फीड में आधे घंटे से ज़्यादा लगना और फिर भी भूखा रहना, माँ के निप्पल पर लगातार ज़ख़्म (पकड़ की जाँच चाहिए), या दूध की सप्लाई गिरती लगे. लैक्टेशन सलाहकार से एक मुलाक़ात कई हफ़्तों की उलझन बचा देती है.

यह लेख सामान्य जानकारी है, चिकित्सा सलाह नहीं — यह आपके डॉक्टर की निजी सलाह की जगह नहीं ले सकता. अपने या अपने बच्चे की सेहत से जुड़ा कोई भी फ़ैसला डॉक्टर से पूछकर ही लें.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: डॉक्टर ने फ़ॉर्मूला जोड़ने को कहा है — क्या अब स्तनपान ख़त्म समझूँ? — बिलकुल नहीं. मिली-जुली फीडिंग (mixed feeding) लंबी चल सकती है, और आपका दूध जितना भी है, उतना काम कर रहा है. सप्लाई बनाए रखने का नियम एक ही है: जितनी बार बच्चा फ़ॉर्मूला पिए, उसके आसपास पंप कीजिए, ताकि छाती को माँग का संदेश मिलता रहे.

सवाल: पंप का दूध कितनी देर रखा जा सकता है? — साफ़ बर्तन में निकाला दूध कमरे के तापमान पर क़रीब चार घंटे, फ़्रिज में क़रीब चार दिन, और डीप फ़्रीज़र में महीनों चलता है. अस्पताल/NICU के लिए उनके लेबल-नियम पूछिए. गर्म करने के लिए गुनगुने पानी में रखिए — सीधे उबालना या माइक्रोवेव नहीं.

सवाल: घरवाले कहते हैं 'इतनी मेहनत से क्या फ़ायदा, डिब्बे का दूध दो.' — मेहनत असली है, इसलिए जवाब भी असली रखिए: विशेष ज़रूरत वाले बच्चे के लिए माँ का दूध दवा जैसा काम करता है — संक्रमण कम, पचना आसान. पर यह भी सच है कि माँ का टूट जाना बच्चे के लिए सबसे महँगा है. बीच का रास्ता — कुछ छाती से, कुछ निकालकर, ज़रूरत पर कुछ फ़ॉर्मूला — कमज़ोरी नहीं, योजना है.

सवाल: निप्पल शील्ड से आदत ख़राब तो नहीं होगी? — शील्ड सही मौक़े पर पुल है — ख़ासकर premature और कमज़ोर पकड़ वाले बच्चों में — और बहुत से बच्चे बाद में उसे छोड़कर सीधी छाती पर आ जाते हैं. उसे लैक्टेशन सलाहकार की देखरेख में शुरू कीजिए और सही नाप की लीजिए; ग़लत नाप की शील्ड दूध कम खिंचवाती है.

सवाल: क्या तनाव से सचमुच दूध सूख जाता है? — तनाव दूध 'सुखाता' नहीं, पर दूध उतरने (let-down) को धीमा कर सकता है — और विशेष ज़रूरत के सफ़र में तनाव कम नहीं होता. जो चीज़ें let-down को मदद करती हैं: बच्चे की तस्वीर/कपड़ा पास रखकर पंप करना, गर्म सेंक, कंधे ढीले, और वही KMC वाला त्वचा-स्पर्श. और दूध की असली मशीन तनाव नहीं, ख़ालीपन है — छाती जितनी बार ख़ाली होगी, दूध उतना बनेगा.

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स्रोत

इस पन्ने का हर चिकित्सकीय आँकड़ा नीचे दी गई गाइडलाइनों से लिया गया है. आपके डॉक्टर की बात अलग हो तो पूछिए कि वे कौन-सी गाइडलाइन मानते हैं.

  1. WHO. Breastfeeding — Fact sheet (2023)
    माँ के दूध के पोषण-सुरक्षा लाभ, जो बीमार और समय-पूर्व शिशुओं में और भी अहम हैं; निकाला दूध भी यही लाभ देता है.
  2. NHS. Breastfeeding and bottle feeding (2023)
    पकड़-स्थिति, दूध निकालना (expressing) और मिली-जुली फीडिंग के व्यावहारिक तरीक़े.

समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम