
दो साल का बच्चा खिलौना नहीं बाँटता, क्योंकि उसका दिमाग़ अभी 'मेरा' सीख रहा है — 'हमारा' उसके बाद आता है. बाँटना उम्र के साथ, बारी के खेल से और घर के उदाहरण से आता है — ज़बरदस्ती से कभी नहीं.
डेढ़-दो साल का बच्चा 'मेरा!' चिल्लाता है तो वह स्वार्थी नहीं हो गया — उसके दिमाग़ ने अभी-अभी 'अपना' होना खोजा है. यह विकास की सीढ़ी है: पहले 'मैं', फिर 'मेरा', तब कहीं जाकर 'तुम्हारा' और 'हमारा'. जो सीढ़ी अभी बनी ही नहीं, उस पर चढ़ने की माँग बच्चे से नहीं की जा सकती.
मोटा नक्शा यह है: दो साल तक साथ-साथ पर अलग-अलग खेलना ही सामान्य है; ढाई-तीन साल में बारी समझ आने लगती है, पर हर बार दिल से मंज़ूर नहीं होती; चार-पाँच साल में सच में बाँटकर खेलना और अदला-बदली शुरू होती है; और छह-सात साल तक इंसाफ़ की समझ ('इसने ज़्यादा देर ले लिया!') पकने लगती है.
इसलिए तीन साल के बच्चे का हर खिलौने पर 'नहीं दूँगा' रिपोर्ट कार्ड नहीं है — न बच्चे का, न आपकी परवरिश का. उम्मीद उम्र के बराबर रखिए, तो झुंझलाहट आधी रह जाती है.
मेहमान के बच्चे के हाथ से रोता हुआ खिलौना छीनकर देना — 'हमारा बेटा तो बाँटता है' — उस पल बड़ों की इज़्ज़त बचाता है, बच्चे को कुछ नहीं सिखाता. बच्चे ने उस पल जो सीखा वह यह है: ताक़तवर जो चाहे ले सकता है, और मेरी चीज़ पर मेरा हक़ तभी तक है जब तक कोई बड़ा नहीं आता.
इससे बाँटने की इच्छा नहीं, चीज़ों को छिपाने और जकड़ने की आदत बनती है. असली sharing की जड़ भरोसा है — 'मेरी चीज़ मुझे वापस मिलेगी' — और ज़बरदस्ती ठीक इसी भरोसे को तोड़ती है.
इसका मतलब यह नहीं कि बच्चा जो चाहे करे. मतलब यह है कि रास्ता हुक्म नहीं, नियम है — और नियम बारी का है, क़ब्ज़े का नहीं: 'अभी इसकी बारी है, फिर तुम्हारी.' बारी बच्चे को मंज़ूर होती है क्योंकि वह दोनों तरफ़ बराबर चलती है.
Sharing सिखाने की सबसे कारगर मशीन है — बारी (turn-taking). घर में रोज़ के छोटे खेलों से शुरू कीजिए: गेंद एक बार तुम्हारी, एक बार मेरी; ब्लॉक एक तुम रखो, एक मैं; रिमोट का बटन एक बार बच्चा दबाए, एक बार आप. 'तुम्हारी बारी… मेरी बारी…' — यह जोड़ा बोलते रहिए, यही शब्द बाद में पार्क में उसके काम आते हैं.
इंतज़ार को दिखने वाला बनाइए. 'पाँच मिनट' बच्चे के लिए हवा है — गिनती ठोस है: 'दस तक गिनो, फिर तुम्हारी बारी.' रसोई का टाइमर या रेत घड़ी और भी अच्छी है, क्योंकि तब नियम मशीन का है, माँ-पापा की मर्ज़ी का नहीं.
बारी की चीज़ और अपनी चीज़ का फ़र्क़ भी साफ़ रखिए. हर बच्चे की दो-तीन ख़ास चीज़ें हो सकती हैं जो बाँटना ज़रूरी नहीं — सबसे प्यारा टेडी, नई किताब. मेहमान आने से पहले वे ऊपर रख दीजिए. बाक़ी सब पर बारी का नियम. 'कुछ चीज़ें सिर्फ़ मेरी हैं' का हक़ मिलते ही बाक़ी चीज़ें बाँटना आसान हो जाता है — यह उल्टा लगता है, पर हर बार यही होता है.
और बाँटने के पल को पकड़कर नाम दीजिए: 'तुमने अपनी गाड़ी दी और उसने तुम्हें ब्लॉक दिए — देखा, बाँटने से दोनों के पास खेल बढ़ गया!' बच्चा नतीजा देखे, तो अगली बार खुद करता है. तारीफ़ काम की हो, चरित्र की नहीं — 'अच्छा बच्चा' नहीं, 'यह बाँटना अच्छा था.'
सबसे कठिन sharing घर के अंदर है. भाई-बहन में हर चीज़ की होड़ इसलिए है कि दाँव सिर्फ़ खिलौना नहीं — माँ-पापा का ध्यान भी है. इसलिए पहला नियम: तुलना कभी नहीं. 'देखो दीदी कैसे दे देती है' — इस वाक्य से sharing नहीं आती, दीदी से चिढ़ आती है.
जिन चीज़ों पर रोज़ लड़ाई होती है, उनके नियम पहले से तय कीजिए: टीवी का रिमोट किसका कब, झूले की बारी कितनी गिनती की, नई चीज़ पहले दिन किसकी. तय नियम हर झगड़े को 'मम्मी किसकी तरफ़ है' के इम्तिहान से बचा लेता है.
हर बच्चे की अपनी कुछ चीज़ें और अपनी अलमारी/डिब्बा — यह भाई-बहन में और भी ज़रूरी है. साझा खिलौने साझा डिब्बे में, निजी चीज़ें अपने डिब्बे में. सीमा साफ़ हो तो उसका सम्मान सिखाना आसान है.
झगड़े में रेफ़री बनने की जल्दी मत कीजिए. 'तुम दोनों मिलकर हल निकालो — या खिलौना दस मिनट अलमारी पर आराम करेगा' — यह तरीक़ा दोनों को बातचीत पर मजबूर करता है. अद्भुत बात यह है कि अलमारी पर रखा खिलौना दो मिनट में समझौता करा देता है.
Sharing भाषण से नहीं, नक़ल से आती है. बच्चा देखता है कि आप अपनी थाली से दादी को परोसते हैं, पड़ोसी को त्योहार की मिठाई जाती है, पापा अपनी चाय का आख़िरी घूँट माँ को देते हैं — यही उसका पाठ्यक्रम है. दिन में एक बार बोलकर बाँटिए: 'यह लड्डू आधा तुम्हारा, आधा मेरा.'
बच्चे से भी माँगिए. बहुत से घरों में बच्चे की हर चीज़ 'उसकी' रहती है और बड़ों की हर चीज़ भी 'उसकी' — इससे इकतरफ़ा हक़ की आदत बनती है. 'एक बाइट मुझे भी दो' कहकर सच में लीजिए, और मिलने पर उतनी ही सच्ची ख़ुशी दिखाइए.
त्योहार और मौक़े इस्तेमाल कीजिए: राखी पर, दीवाली पर, जन्मदिन पर बच्चे के हाथ से बँटवाइए — मिठाई पड़ोस में, पुराने खिलौने-कपड़े ज़रूरतमंद बच्चों को. देने की ख़ुशी एक बार शरीर में उतर जाए, तो sharing नैतिक शिक्षा नहीं रह जाती, स्वभाव बन जाती है.
सवाल: मेहमान का बच्चा खिलौना घर ले जाने की ज़िद करे तो? — यह sharing का नहीं, सीमा का सवाल है. नरमी से साफ़ कहिए: 'खिलौना इसी घर में रहता है — अगली बार आओगे तो फिर खेलना.' अपने बच्चे के सामने उसकी चीज़ बिना पूछे देना उसका भरोसा तोड़ता है. देना ही हो, तो बच्चे से पूछकर — और 'नहीं' को मंज़ूर करके.
सवाल: बच्चा खाना तो बाँट देता है पर खिलौने कभी नहीं. यह कैसा है? — बिलकुल सामान्य. खाना ख़त्म होकर फिर मिलता है, खिलौना 'चला गया तो गया' लगता है — बच्चे का हिसाब सही है. खिलौने के लिए बारी का भरोसा बनाइए: दूसरे के हाथ से खिलौना समय पर वापस दिलवाइए, हर बार. वापसी पक्की हो जाए तो देना आसान हो जाता है.
सवाल: बच्चा दूसरों से माँगकर तो खेलता है, अपनी बारी पर 'नहीं' कह देता है. — अगली बार माँगने से पहले नियम याद दिलाइए: 'उसकी गाड़ी माँगोगे, तो अपनी साइकिल की बारी भी दोगे — मंज़ूर?' मंज़ूरी लेकर खेल शुरू कराइए और वादे पर टिकाइए. एक-दो बार बारी न देने पर अगली माँग रुक जाए, तो हिसाब खुद समझ आ जाता है.
सवाल: क्या sharing न करना आगे चलकर स्वार्थी बनाता है? — नहीं — तीन साल की उम्र का 'मेरा!' और बड़े होकर स्वार्थ, दो अलग चीज़ें हैं. शोध और अनुभव दोनों यही कहते हैं कि जिन बच्चों को अपनी चीज़ों पर भरोसे का हक़ मिला, वे बड़े होकर ज़्यादा खुले हाथ के बनते हैं. चिंता तब कीजिए जब छह-सात साल के बाद भी हर चीज़ पर झपट और जकड़ बनी रहे — तब भी इलाज डाँट नहीं, बारी के नियम और घर का उदाहरण ही है.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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