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बच्चों का ग़ुस्सा: नखरे, चीख़ और हाथ चलाने से निपटने का शांत तरीक़ा

परवरिश और व्यवहार · theAsianparent · अपडेट किया गया

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बच्चों का ग़ुस्सा: नखरे, चीख़ और हाथ चलाने से निपटने का शांत तरीक़ा

बच्चे का ग़ुस्सा ख़राब परवरिश का सबूत नहीं — अधूरे बने दिमाग़ का सामान्य तूफ़ान है. काम की बात यह है कि तूफ़ान के बीच क्या करना है, और तूफ़ानों के बीच के शांत दिनों में क्या सिखाना है.

ग़ुस्से के पीछे क्या है: अधूरा दिमाग़, पूरी भावना

दो से पाँच साल के बच्चे के पास भावनाएँ पूरी ताक़त की हैं — ग़ुस्सा, मायूसी, ईर्ष्या — पर उन्हें सँभालने वाला दिमाग़ का हिस्सा (आगे का हिस्सा, जो रोक-टोक और सोच-विचार करता है) अभी बन ही रहा है. नखरा इसी का नतीजा है: इंजन पूरा, ब्रेक अधूरे.

इसलिए पहला सच: नखरे को रोकना पूरी तरह आपके हाथ में नहीं है, और हर नखरा आपकी असफलता नहीं है. दूसरा सच: नखरे के पल में तर्क, भाषण और सवाल ('क्यों कर रहे हो ऐसा?') बेकार हैं — तूफ़ान के बीच में स्कूल नहीं चलता.

ग़ुस्से के ज़्यादातर दौरे चार चीज़ों से शुरू होते हैं: भूख, थकान, नींद और 'नहीं' सुनना. हफ़्ते भर नखरों की डायरी रखिए — कब, कहाँ, किससे पहले — और आधे नखरे पैटर्न में दिख जाएँगे. शाम पाँच बजे वाला रोज़ का नखरा असल में साढ़े चार बजे के नाश्ते से हल होता है.

तूफ़ान के बीच में: उसी पल क्या करें

पहला काम अपने ऊपर: आवाज़ नीची, चेहरा शांत, घुटनों पर बैठकर बच्चे की ऊँचाई पर आइए. बच्चे का दिमाग़ उस पल आपकी बातें नहीं, आपकी हालत पढ़ रहा है. आप चीख़े, तो आग में घी; आप शांत, तो तूफ़ान को किनारा मिलता है.

भावना को नाम दीजिए और मंज़ूरी दीजिए — माँग को नहीं: 'तुम्हें बहुत ग़ुस्सा आ रहा है, क्योंकि टीवी बंद हुआ. ग़ुस्सा आना ठीक है.' यह जादू का वाक्य नहीं है, पर बच्चे को शब्द देता है और बताता है कि भावना अपराध नहीं है. माँग पर फ़ैसला वही रहता है जो था — 'टीवी अब नहीं खुलेगा.' नरम लहजा, पक्का फ़ैसला — यही जोड़ी काम करती है.

हाथ चलने लगे — मारना, काटना, चीज़ें फेंकना — तो शरीर को रोकिए, शांति से: हाथ थामकर 'मारने नहीं दूँगी. ग़ुस्सा ठीक है, मारना नहीं.' ज़रूरत हो तो बच्चे को उठाकर शांत जगह ले जाइए और पास बैठिए. यह सज़ा नहीं, हिफ़ाज़त है — अकेले कमरे में बंद करना इस उम्र में डर सिखाता है, सबक़ नहीं.

भरे बाज़ार या रिश्तेदारों के सामने नखरा हो तो सबसे पहले दर्शकों को दिमाग़ से हटाइए. 'लोग क्या कहेंगे' के दबाव में लिया गया फ़ैसला — चिल्लाना या माँग पूरी कर देना — दोनों ग़लत पड़ते हैं. हो सके तो बच्चे को गोद में लेकर किनारे जाइए; न हो सके तो वहीं घुटनों पर बैठकर वही शांत तरीक़ा. तमाशा तभी तक है जब तक आप तमाशे का हिस्सा हैं.

और नखरा जो चीज़ माँगने से शुरू हुआ, वह चीज़ नखरे से कभी न मिले — यह घर का पत्थर का नियम हो. एक बार भी चीख़ने से चॉकलेट मिल गई, तो बच्चे ने सीख लिया कि चीख़ काम करती है — और अगली चीख़ लंबी होगी.

तूफ़ान के बाद: जोड़िए, समझाइए, आगे बढ़िए

नखरा उतरते ही बच्चा अक्सर थका, शर्मिंदा और चिपकने वाला होता है. यही जुड़ने का पल है — गले लगाइए. यह नखरे का इनाम नहीं है; यह भरोसे की मरम्मत है: 'तुम्हारे सबसे बुरे पल में भी मैं तुम्हारे साथ हूँ.'

फिर, जब सब सामान्य हो, दो वाक्य की समीक्षा — भाषण नहीं: 'बहुत ग़ुस्सा आया था न. अगली बार ग़ुस्सा आए तो ज़ोर से बोलना — मुझे ग़ुस्सा आ रहा है! — मैं मदद करूँगी.' बस. पुराने नखरे की याद बार-बार दिलाना ('कल कितना तमाशा किया था') शर्म बढ़ाता है, सीख नहीं.

अगर नखरे में कुछ टूटा-बिखरा है, तो बच्चा समेटने में हाथ बटाए — सज़ा की तरह नहीं, ज़िम्मेदारी की तरह: 'चलो, मिलकर उठाते हैं.' करके सुधारना छोटे बच्चे की माफ़ी है.

शांत दिनों की ट्रेनिंग: ग़ुस्से को शब्द दीजिए

असली काम नखरों के बीच के शांत दिनों में होता है. भावनाओं के शब्द रोज़ की बोलचाल में लाइए: ख़ुश, उदास, ग़ुस्सा, डर, बोर. किताब के किरदारों में पहचानिए ('यह बंदर ग़ुस्से में क्यों है?'), अपने दिन में बोलिए ('आज मम्मी थकी है, इसलिए चिड़चिड़ी है'). जिस भावना का नाम है, वह चीख़ से नहीं, नाम से बाहर आ सकती है.

ग़ुस्सा निकालने के मंज़ूर रास्ते सिखाइए और अभ्यास कराइए — खेल-खेल में, पहले से: ग़ुब्बारे की साँस (नाक से लंबी साँस, मुँह से ग़ुब्बारा फुलाने जैसी छोड़ना), तकिये में घूँसा, काग़ज़ फाड़ना, ज़ोर से दस तक गिनना, ठंडा पानी. नखरे के बीच नई तरकीब नहीं सीखी जा सकती — पर पहले से रटी तरकीब आधे-उतरे ग़ुस्से में काम कर जाती है.

अपना ग़ुस्सा भी दिखाइए — सँभला हुआ: 'मुझे अभी बहुत ग़ुस्सा आ रहा है, मैं दो मिनट चुप रहकर पानी पीती हूँ.' बच्चा ग़ुस्सा सँभालना ठीक वहीं से सीखता है जहाँ से बोलना सीखता है — आपको देखकर. जिस घर में बड़े चीख़ते हैं, वहाँ बच्चे को 'चीख़ना मत' सिखाना पानी में लिखना है.

चुनाव देना भी ग़ुस्सा घटाता है. दिन भर 'नहीं-नहीं-नहीं' सुनता बच्चा कहीं न कहीं फटेगा. जहाँ हाँ कही जा सकती है, वहाँ हाँ कहिए; जहाँ नहीं है, वहाँ दो विकल्प दीजिए: 'टीवी नहीं — किताब या ब्लॉक?' थोड़ा-सा बस अपने हाथ में होने का एहसास बड़े-बड़े तूफ़ान टाल देता है.

कब यह नखरे से ज़्यादा है

नखरे सामान्य हैं, पर कुछ निशान ऐसे हैं जिन पर बाल-रोग विशेषज्ञ या चाइल्ड काउंसलर से बात करनी चाहिए: पाँच-छह साल के बाद भी रोज़ लंबे, हिंसक नखरे; ग़ुस्से में खुद को चोट पहुँचाना (सिर पटकना जो चोट तक जाए); साँस रोक लेना और नीला पड़ना; हर नखरे के साथ नींद, खाने या स्कूल में लगातार परेशानी; या ऐसा ग़ुस्सा जो घर के किसी बड़े तनाव — झगड़े, बदलाव, नुक़सान — के बाद शुरू हुआ हो.

मदद माँगना परवरिश की हार नहीं है. जैसे बुख़ार लंबा खिंचे तो डॉक्टर, वैसे ग़ुस्सा पैटर्न से बाहर जाए तो सलाह — यह उतना ही सामान्य होना चाहिए.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: बच्चा ग़ुस्से में मुझे ही मारता है. उस पल क्या करूँ? — हाथ थामकर शांत, पक्की आवाज़ में: 'मारने नहीं दूँगी.' फिर भावना को नाम: 'ग़ुस्सा आ रहा है, बोलकर कहो.' वापस मारना, या हँस देना — दोनों ग़लत सिखाते हैं. बार-बार हो तो देखिए कि मार किस हालात में चलती है — अक्सर वही भूख-थकान-स्क्रीन बंद वाला पैटर्न निकलता है.

सवाल: नखरे में बच्चे को नज़रअंदाज़ करना (ignore) ठीक है या ग़लत? — माँग को नज़रअंदाज़ कीजिए, बच्चे को नहीं. पास रहिए, शांत रहिए, माँग पर अड़े रहिए — यह ignore नहीं, मौजूदगी है. कमरे से चले जाना या मुँह फेर लेना छोटे बच्चे में छोड़ दिए जाने का डर जगाता है, और डर ग़ुस्से का इलाज नहीं है.

सवाल: दादा-दादी नखरे पर तुरंत माँग पूरी कर देते हैं. — यह हर संयुक्त परिवार की कहानी है. बड़ों से अकेले में, इज़्ज़त से, एक ही बात माँगिए: 'लाड़ आप जितना चाहें कीजिए — बस चीख़ने पर चीज़ न मिले, यह नियम सबका रहे.' और जो नियम सबसे ज़रूरी हों (मारना नहीं, सड़क पर हाथ छोड़ना नहीं), उन्हें गिनकर तीन-चार रखिए — हर बात पर टोका-टाकी से बड़े भी चिढ़ते हैं और नियम भी घिस जाते हैं.

सवाल: मेरा बच्चा ग़ुस्से में साँस रोक लेता है और चेहरा लाल-नीला हो जाता है. — साँस रोकने के दौरे (breath-holding spells) डरावने दिखते हैं पर ज़्यादातर एक-दो मिनट में खुद ठीक हो जाते हैं और उम्र के साथ चले जाते हैं. बच्चे को करवट लिटाइए, मुँह में कुछ मत डालिए, झिंझोड़िए मत. पहली बार हुआ हो, बेहोशी लंबी लगे, या झटके आएँ — तो डॉक्टर को ज़रूर दिखाइए, और वैसे भी एक बार बाल-रोग विशेषज्ञ से इसका ज़िक्र कर दीजिए.

सवाल: क्या थप्पड़ से ग़ुस्सा ठीक होता है? — नहीं — थप्पड़ उसी चीज़ का प्रदर्शन है जिसे आप रोकना चाह रहे हैं: बड़ी भावना, हाथ के रास्ते. शोध लगातार यही कहता है कि मार से बच्चे का ग़ुस्सा घटता नहीं, छिपता और लौटता है — साथ में झूठ और डर आता है. जो पल थप्पड़ तक ले आता है, वह असल में आपके अपने ग़ुब्बारे की साँस का पल है.

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समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम