खेल और गतिविधियां

बच्चों के लिए तैराकी के फ़ायदे: कब शुरू करें, क्या सिखाएँ, कैसे सुरक्षित रखें

खेल और गतिविधियां · theAsianparent · अपडेट किया गया

Google पर पसंदीदा
बच्चों के लिए तैराकी के फ़ायदे: कब शुरू करें, क्या सिखाएँ, कैसे सुरक्षित रखें

तैराकी अकेला ऐसा खेल है जो कसरत भी है और जान बचाने वाला हुनर भी. सही उम्र पर, सही क्लास में, सही नियमों के साथ — पानी बच्चे का दोस्त बनता है, डर नहीं.

तैराकी बच्चे को क्या देती है

शरीर को: तैराकी पूरे शरीर की कसरत है — बाज़ू, टाँगें, पीठ, साँस — बिना जोड़ों पर वज़न डाले. बढ़ते बच्चे के लिए यह ताक़त, लचक और दम (stamina) तीनों एक साथ बनाती है, और मोटापे की उम्र में यह सबसे मज़ेदार कैलोरी-ख़र्च है. अस्थमा वाले कई बच्चों के लिए तैराकी की लयदार साँस मददगार मानी जाती है — अपने डॉक्टर से पूछकर, ठीक से क्लोरीन-संतुलित पूल में.

दिमाग़ को: पानी में शरीर के दोनों हिस्से तालमेल से चलते हैं — यह तालमेल (coordination) और शरीर-संतुलन की ट्रेनिंग है. और हर माता-पिता की पसंदीदा बात: स्विमिंग वाले दिन की रात की नींद सबसे गहरी होती है — पानी बच्चे की बैटरी पूरी ख़र्च कराता है.

मन को: पानी का डर पार करना बच्चे के आत्मविश्वास की बड़ी जीत होती है. 'मैं तैर लेता हूँ' का भरोसा पूल से बाहर भी चलता है. और समूह की क्लास में बारी, नियम, कोच की बात सुनना — यह सब मुफ़्त में साथ आता है.

और सबसे बड़ी बात: तैरना जीवन-रक्षक हुनर है. डूबना बच्चों की मौतों के बड़े कारणों में है — तैरना सीखना उसका सबसे सीधा बचाव है. यही एक तर्क बाक़ी सब पर भारी है.

किस उम्र से: पानी की दोस्ती बनाम असली क्लास

छह महीने से दो-तीन साल: यह 'तैरना सीखने' की नहीं, पानी से दोस्ती की उम्र है — माता-पिता के साथ पानी में खेलना, छपाके, गाने. इसे parent-toddler क्लास कहते हैं; इनसे बच्चा तैराक नहीं बनता, पर पानी का सहज होना बनता है. ध्यान रहे: यह उम्र पानी में भी सबसे ज़्यादा निगरानी माँगती है, और ऐसी क्लास बच्चे को 'डूबने से सुरक्षित' नहीं बनाती.

क़रीब चार साल से: ज़्यादातर बच्चे अब असली सिखाई पकड़ पाते हैं — साँस रोकना, पानी में मुँह डालना, किक, तैरकर किनारे लौटना. चार-पाँच साल औपचारिक स्विमिंग क्लास शुरू करने की सबसे आम और समझदार उम्र है.

छह-सात साल से: स्ट्रोक की तकनीक — फ्रीस्टाइल, बैकस्ट्रोक — अब ठीक से बैठती है. देर से शुरू करने में कोई हर्ज नहीं: दस साल का नया तैराक भी महीनों में सब पकड़ लेता है. डर बैठ चुका हो तो और भी धीरज से, पर रास्ता वही है.

मौसम की भारतीय सच्चाई: ज़्यादातर खुले पूल गर्मियों के हैं — अप्रैल से सितंबर की क्लासें भर जाती हैं. साल भर सिखाना हो तो गर्म (heated/indoor) पूल खोजिए, और ठंडे महीनों में ज़बरदस्ती ठंडे पानी की क्लास से बच्चे का पानी-प्रेम मत तुड़वाइए.

अच्छी स्विमिंग क्लास की पहचान

पहली जाँच निगरानी की: पूल पर प्रशिक्षित लाइफ़गार्ड/कोच हर समय, और छोटे बच्चों की क्लास में पानी के अंदर कोच. बैच छोटा हो — शुरुआती बच्चों में एक कोच पर चार-छह बच्चे से ज़्यादा नहीं. 'बीस बच्चे, किनारे से सीटी वाला एक कोच' — यह क्लास नहीं, जोखिम है.

दूसरी जाँच पानी की: साफ़ दिखता पानी, क्लोरीन की हल्की (तेज़ नहीं) गंध, दिखता हुआ सफ़ाई-रिकॉर्ड, और छोटे बच्चों के लिए उथला हिस्सा या अलग बेबी-पूल. तीसरी: तरीक़ा — पहले हफ़्तों में खेल-खेल में पानी की आदत, फिर तकनीक; डराकर-धकेलकर सिखाने वाली जगह से बच्चे को तैरना नहीं, पानी का डर मिलता है.

और यह ज़रूर पूछिए: बारिश-बिजली में क्लास का नियम क्या है, चोट-इमरजेंसी की तैयारी क्या है, और मेकअप क्लास मिलती है या नहीं. अच्छी जगहें इन सवालों का जवाब लिखा हुआ रखती हैं.

सुरक्षा के नियम जो क्लास के बाहर भी चलते हैं

नियम 1 — तैरना जानने का मतलब निगरानी की छुट्टी नहीं: तैरना सीखा हुआ बच्चा भी पानी में बड़े की नज़र के बिना नहीं. 'अच्छा तैर लेता है' सुनकर ही ज़्यादातर हादसों की कहानी शुरू होती है. नियम 2 — पानी के पास दौड़ना नहीं, धक्का नहीं, और गहराई में कूदने से पहले गहराई पक्की करना.

नियम 3 — inflatable ट्यूब-आर्मबैंड खिलौने हैं, जीवनरक्षक नहीं: हवा निकलती है, हाथ से फिसलते हैं. छोटे बच्चे की असली सुरक्षा बड़े का हाथ की दूरी (arm's reach) में रहना है. नियम 4 — खाने के तुरंत बाद की भारी क्लास से बचिए, पानी पीते रहिए (तैरने में भी पसीना छूटता है), और धूप के पूल में वॉटरप्रूफ़ सनस्क्रीन.

कान-आँख की छोटी देखभाल: तैराकी का चश्मा आँखों की जलन बचाता है; कान में पानी रह जाए तो सिर झुकाकर उछलना काफ़ी है, कान में कुछ डालना नहीं. बार-बार कान दर्द हो तो डॉक्टर से ईयर-प्लग की सलाह लीजिए. और पूल के बाद साबुन-शैंपू का स्नान — क्लोरीन त्वचा-बालों पर छोड़ना नहीं.

घर-गाँव की सच्चाई भी: तालाब-नदी-नहर में सीखना परंपरा है, पर वहाँ गहराई-बहाव-तल अनजाने हैं. जहाँ तक हो, सीखने के लिए निगरानी वाला पूल; प्राकृतिक पानी में बड़े साथ हों, किनारे से, जान-पहचानी जगह पर.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: बच्चा पानी से बहुत डरता है, क्लास में रोता है. ज़बरदस्ती भेजें? — ज़बरदस्ती से डर पक्का होता है. पीछे हटकर छोटे क़दम लीजिए: बाल्टी-मग के खेल, घर में मुँह पर पानी की आदत, फिर पूल किनारे बैठकर देखना, फिर आपके साथ उथले में. कोच से बात कीजिए — अच्छे कोच डरे बच्चे के लिए रफ़्तार धीमी कर देते हैं. कुछ हफ़्तों की देर, ज़िंदगी भर के डर से सस्ती है.

सवाल: लड़कियों के लिए अलग व्यवस्था कैसे खोजें? — बड़े शहरों में महिला कोच वाली और ladies-only बैच अब आम हैं — सोसाइटी के पूल, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और कुछ स्कूलों में पूछिए. पहनावे के लिए फुल-बॉडी स्विमसूट/बर्किनी हर जगह मान्य हैं. बात सिर्फ़ सहजता की है — जिस व्यवस्था में बच्ची और परिवार सहज हों, वही सही व्यवस्था है.

सवाल: कान में बार-बार पानी जाने से इन्फ़ेक्शन का डर है. — तैराकों का कान (swimmer's ear) असली चीज़ है पर रोकी जा सकती है: हर सत्र के बाद सिर झुकाकर पानी निकालना, तौलिये से बाहर का कान सुखाना, और बार-बार दिक़्क़त पर डॉक्टर की सलाह से ईयर-प्लग. कान में दर्द, खुजली या बहना दिखे तो पूल रोककर डॉक्टर — बूँदें डालने का फ़ैसला भी डॉक्टर का.

सवाल: क्लोरीन से बाल-त्वचा ख़राब होते हैं? — क्लोरीन रूखापन देता है, नुक़सान का इंतज़ाम आसान है: पूल से पहले सादे पानी से भीगना (भीगे बाल क्लोरीन कम सोखते हैं), स्विम-कैप, और बाद में शैंपू-साबुन + मॉइस्चराइज़र. इतने से ज़्यादातर बच्चों की त्वचा-बाल ठीक रहते हैं. एक्ज़िमा वाले बच्चे के लिए डॉक्टर से पहले बात कर लीजिए.

सवाल: क्या स्विमिंग से क़द बढ़ता है? — क़द जीन और पोषण से तय होता है — कोई खेल क़द नहीं 'बढ़ाता'. हाँ, तैराकी मुद्रा (posture) सुधारती है और पीठ-कंधे की मांसपेशियाँ खींचकर बच्चे को सधा-लंबा दिखाती ज़रूर है. स्विमिंग क़द के लिए नहीं, सेहत-हुनर-ख़ुशी के लिए कराइए — वे तीनों पक्के हैं.

SportsActivitiesSafety

समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम