
अचानक हर घंटे भूख? घबराइए मत — यह पहला ग्रोथ स्पर्ट है, दो-तीन दिन की आँधी. और इसी हफ़्ते से शुरू होती है ज़िंदगी की पहली कसरत: पेट के बल के कुछ मिनट.
तीसरे हफ़्ते के आसपास एक दिन अचानक सब बिगड़ा-सा लगता है — जो बच्चा तीन घंटे के अंतराल पर आ गया था, वह फिर हर घंटे छाती माँगता है, और छोड़ने पर रोता है. घर में तुरंत फ़ैसला सुना दिया जाता है: 'दूध कम पड़ गया.'
फ़ैसला ग़लत है. यह पहला ग्रोथ स्पर्ट है — बढ़त की रफ़्तार का झोंका, जिसमें बच्चा बार-बार पीकर अगले दिनों की सप्लाई बढ़वाता है. दो-तीन दिन में माँग और आपूर्ति फिर बराबर हो जाती है.
इन दो-तीन दिनों में एक ही काम है — पिलाती रहिए, पानी पीती रहिए, और फ़ॉर्मूला के डिब्बे से दूर रहिए. यहीं पर डिब्बा खुला, तो छाती की माँग घटी — और जो कमी अफ़वाह थी, वह सच बन जाती है.
ग्रोथ स्पर्ट के साथ वज़न की चाल अच्छी चलती है — हफ़्ते में 150-200 ग्राम या ज़्यादा. दूध पीने का ढंग भी बदलता है: अब बच्चा ज़्यादा कुशल है, दस मिनट में उतना पी लेता है जितना पहले हफ़्ते आधे घंटे में पीता था.
गर्दन की ताक़त पहली परीक्षा देती है — पेट के बल लिटाने पर सिर को पल भर के लिए उठाने-घुमाने की कोशिश. यही टमी टाइम की शुरुआत है: जागते हुए, आपकी निगरानी में, दिन में दो-तीन बार, दो-तीन मिनट से.
आवाज़ों की पहचान अब साफ़ दिखती है — माँ की आवाज़ पर रोना धीमा पड़ना इस उम्र का सबसे प्यारा करतब है. एकटक चेहरों को देखना बढ़ रहा है; काले-सफ़ेद कंट्रास्ट वाली चीज़ें (खिड़की की ग्रिल, आपकी चूड़ियाँ) उसे सबसे दिलचस्प लगती हैं.
शाम की बेचैनी अब रंग दिखा सकती है — तय समय पर रोना, टाँगे पेट की ओर खींचना, चेहरा लाल. यह कोलिक की आहट है; उसका पूरा हिसाब अगले हफ़्तों में, पर एक वाक्य अभी: यह बीमारी नहीं है और यह गुज़र जाती है.
नींद का क़र्ज़ अब चढ़ चुका है, और उसका एक ही किफ़ायती इलाज है: बच्चा सोए तो आप भी सोइए — बर्तन-कपड़े-मेहमान उस नींद से क़ीमती नहीं हैं. 'दिन में सोना अच्छा नहीं लगता' वाली झिझक इन हफ़्तों के लिए स्थगित रहे.
हरीरा, पंजीरी, गोंद के लड्डू, सोंठ — ज़च्चा-खाने की परंपरा ऊर्जा और घी-मेवे के लिहाज़ से समझदार है. बस वह खाने के साथ चले, खाने की जगह नहीं — दूध की मशीन को दाल-रोटी-सब्ज़ी-पानी का सादा, पूरा खाना चाहिए.
टाँकों का दर्द अब घट रहा होना चाहिए. न घटे, या बैठना फिर मुश्किल होने लगे, तो अगली मुलाक़ात का इंतज़ार मत कीजिए. और क़ब्ज़ (टाँकों के डर से रोकना) — पानी, रेशा, और ज़रूरत पर डॉक्टर की बताई दवा; ज़ोर लगाना टाँकों का दुश्मन है.
टमी टाइम रोज़ की सूची में — जागते हुए, सख़्त-सपाट सतह पर, आप सामने बैठकर. रोए तो अपनी छाती पर लिटाकर कीजिए — वह भी टमी टाइम है. यह गर्दन-काँधे की वही ताक़त बनाता है जिस पर आगे पलटना-बैठना खड़ा होगा.
ग्रोथ स्पर्ट के दिनों का घर-नियम: माँ का काम सिर्फ़ पिलाना; बाक़ी सब — खाना, बर्तन, बड़े बच्चे — बँटा हुआ. दो दिन की यह व्यवस्था फ़ॉर्मूला के डिब्बे से सस्ती और बेहतर है.
बाहर घुमाना शुरू करना हो तो सुबह की धूप का छोटा चक्कर ठीक है — भीड़-बाज़ार अभी नहीं. मच्छरदानी बिस्तर पर लगी रहे; नवजात पर क्रीम-कॉइल का जवाब जाली ही है.
जो लोग गोद लेना चाहें उनके लिए घर का नियम बन जाए: हाथ धोकर, सर्दी-खाँसी हो तो दूर से, और चूमना चेहरे पर नहीं. यह कहने का काम पिता का है — माँ हर बार 'ना' कहते-कहते थक जाती है.
इस सप्ताह की ज़रूरी बातें एक जगह. आपके शिशु के हिसाब से डॉक्टर इनमें बदलाव बता सकते हैं.
| बात | तीसरे सप्ताह में |
|---|---|
| मुख्य घटना | पहला ग्रोथ स्पर्ट — 2-3 दिन की बढ़ी भूख |
| उसका जवाब | बार-बार पिलाना; फ़ॉर्मूला का डिब्बा नहीं |
| नई कसरत | टमी टाइम — 2-3 मिनट, दिन में 2-3 बार, निगरानी में |
| बच्चा पहचानता है | माँ की आवाज़; एकटक चेहरे देखना |
| शामें | कोलिक की आहट मुमकिन — बीमारी नहीं |
| माँ | बच्चा सोए तो सोना — नींद का क़र्ज़ यहीं चुकता है |
| घर का नियम | हाथ धोकर गोद; बीमार मेहमान दूर |
वही पक्की सूची — तीन महीने से छोटे का बुख़ार, दूध छोड़ना, तेज़ साँस (60+/मिनट), सुस्ती, झटके, फैलता पीलिया, घटते गीले डायपर: उसी समय अस्पताल.
रोने के बारे में लकीर: कोलिक का रोना तय समय की आँधी है जो आती-जाती है — पर लगातार तीखा-कमज़ोर रोना, रोते-रोते नीला पड़ना, या रोने के साथ उल्टियाँ-बुख़ार अलग चीज़ है. शक हो तो 'कोलिक होगा' मानकर मत बैठिए — एक बार दिखा लीजिए.
यह लेख सिर्फ़ सामान्य जानकारी के लिए है. यह व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह की जगह नहीं ले सकता. आपके शिशु की सेहत, जन्म के हालात और जाँचों का पूरा हाल देखकर सलाह वही दे सकते हैं — आपके बाल-रोग विशेषज्ञ या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर.
आख़िरी बार दूध कब पिलाया, अगली बार कौन सी तरफ़ से, आज कितने गीले डायपर — इन हफ़्तों के तीनों बड़े सवालों का रिकॉर्ड यह साधन रखता है. सब आपके फ़ोन में ही रहता है.
सारे रिकॉर्ड आपके ही फ़ोन में रहते हैं — हमें नहीं भेजे जाते. स्तन पर कितने मिनट रहा, इससे यह तय नहीं होता कि बच्चे को काफ़ी दूध मिला या नहीं; कुछ बच्चे झटपट पीते हैं. गीले डायपरों की गिनती और डॉक्टर के यहाँ होने वाला वज़न — यही असली पैमाने हैं.
सवाल: ग्रोथ स्पर्ट में फ़ॉर्मूला 'बस दो दिन के लिए' देने में क्या हर्ज है? — हर्ज यही कि वह दो दिन नहीं रहता. जितना फ़ॉर्मूला अंदर, उतनी माँग छाती से बाहर — और सप्लाई माँग से बनती है. दो दिन की आँधी को छाती से ही निकालिए; वही इसका डिज़ाइन है.
सवाल: टमी टाइम में बच्चा तुरंत रोने लगता है — रहने दूँ? — छोड़िए मत, छोटा कीजिए: एक-एक मिनट के टुकड़े, दूध के बाद नहीं (उलटने का डर), आपकी छाती या गोद पर भी चलता है. हफ़्तों में यह नापसंद खेल बन जाता है.
सवाल: बच्चे की साँस कभी तेज़, कभी रुकी-सी लगती है — डरूँ? — नवजात की साँस लय बदलती है — तेज़ चलकर पल भर ठहरना (5-10 सेकंड) सामान्य है. डरने की बातें: मिनट में 60 से ऊपर लगातार, पसलियाँ धँसना, नीला पड़ना, या 20 सेकंड से लंबा ठहराव — ये उसी समय अस्पताल की सूची में हैं.
सवाल: नाख़ून कब और कैसे काटें? — नहाने-सोने के बाद, नरम हों तब, बेबी नेल-कटर से — या पहले हफ़्तों में सूती दस्ताने ही पहना दीजिए. मुँह से कुतरना नहीं — संक्रमण का रास्ता है.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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