परवरिश और व्यवहार

बच्चे को खेल से निकाल दें, बर्थडे में न बुलाएं — उस पल माता-पिता की सबसे आम ग़लती

परवरिश और व्यवहार · theAsianparent · अपडेट किया गया

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बच्चे को खेल से निकाल दें, बर्थडे में न बुलाएं — उस पल माता-पिता की सबसे आम ग़लती

अपने बच्चे को खेल से बाहर होते देखना कलेजा चीरता है — और ठीक उसी पल हममें से ज़्यादातर वह ग़लती करते हैं जो बच्चे को कमज़ोर बनाती है: झट से मैदान में कूद पड़ना. विशेषज्ञ कहते हैं — बच्चे को बचाने वाला नहीं, संभलना सिखाने वाला चाहिए.

हर घर की कहानी: 'तू नहीं खेलेगा'

दृश्य बदलते हैं, चोट वही रहती है. सोसाइटी के पार्क में क्रिकेट चल रहा है और आपके बेटे को 'टीम पूरी है' कहकर लौटा दिया गया. क्लास के व्हाट्सऐप ग्रुप पर बर्थडे का न्योता घूमा और आपकी बेटी का नाम छूट गया. पारिवारिक शादी में चचेरे भाई-बहनों की टोली बनी और आपका बच्चा दरवाज़े पर खड़ा देखता रहा. सिंगापुर के CNA TODAY की एक हालिया रिपोर्ट में माता-पिता की ऐसी ही कहानियां दर्ज हैं — खेल से भगाया गया छह साल का बच्चा, दावत से कटा नाम, और एक 17 साल का लड़का जो बचपन भर 'तुझे यह पसंद नहीं आएगा' सुनकर आज भी नई दोस्ती से डरता है.

पहली बात जो हर माता-पिता को सुननी चाहिए: कभी-कभार का ठुकराया जाना बचपन का सामान्य — और ज़रूरी — हिस्सा है. हर बच्चा कभी टीम से बाहर रहेगा, कभी न्योते से. यह अपने आप में कोई घाव नहीं है.

पर विशेषज्ञ दो चीज़ें अलग करते हैं: कभी-कभार की चोट, और जान-बूझकर, बार-बार का बहिष्कार. दिमाग़ की तस्वीरें (ब्रेन स्कैन) बताती हैं कि लगातार अलग किए जाने पर दिमाग़ का वही हिस्सा जागता है जो शारीरिक दर्द में जागता है — यानी 'बच्चे हैं, भूल जाएंगे' वाली तसल्ली आधी ही सच है. लगातार का बहिष्कार बच्चे के भीतर 'कमी मुझमें है' की कहानी लिख देता है — और वही कहानी आगे आत्मविश्वास और नई दोस्तियों को खाती है.

और सबसे ज़रूरी बात, जो इस पूरे लेख की धुरी है: उन पलों में बच्चे पर क्या गुज़रेगी, यह अक्सर ठुकराए जाने से तय नहीं होता — आपकी प्रतिक्रिया से तय होता है.

सबसे आम ग़लती: झट से बचाने कूद पड़ना

बच्चे को ठुकराया देखकर हमारे भीतर जो उबाल आता है, वह सच्चा है — विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि उस पल अक्सर हमारा अपना बचपन भी जाग जाता है: हमें याद आ जाता है कि छूट जाना कैसा लगता था. इसीलिए हाथ सीधे हथियार की ओर जाता है — दूसरे बच्चे को डांट दें, उसकी मां को सुना दें, बर्थडे वाले घर से रिश्ता तोड़ दें, बच्चे को उस पार्क से ही हटा लें.

पर हर बार झट से बचाने का संदेश बच्चे को उल्टा पहुंचता है: 'यह स्थिति इतनी भयानक है कि तू इसे संभाल ही नहीं सकता — मम्मी-पापा ही संभाल सकते हैं.' जो बच्चा हर बार बचाया जाता है, वह यही सीखता है कि वह ख़ुद कुछ नहीं कर सकता. और एक बारीक़ बात और: कई बार बच्चे को उतनी चोट लगी ही नहीं होती जितनी हमें लग जाती है — हमारी बड़ी प्रतिक्रिया ही उसे बताती है कि जो हुआ वह 'भयानक' था.

इसका मतलब यह नहीं कि हाथ पर हाथ धरे बैठें. मतलब क्रम का है: पहले भावना, फिर हल — और हल जहां तक हो, बच्चे के हाथ से. (हां, जहां बात लगातार के बहिष्कार या बदमाशी की हो, वहां बड़ों का दख़ल ज़रूरी है — उस पर आगे.)

सही क्रम: पहले सुनिए, फिर संभलने दीजिए

पहला क़दम — बैठकर सुनना: 'बहुत बुरा लगा होगा. मुझे बताओ क्या हुआ.' भावना को नाम और मंज़ूरी मिलते ही बच्चे का तूफ़ान उतरने लगता है — यह वही तरीक़ा है जो ग़ुस्से के नखरों में काम करता है, और यहां भी विज्ञान वही है: समझा हुआ महसूस करते ही दिमाग़ शांत होकर सोचने लायक़ होता है.

दूसरा क़दम — कमान बच्चे को: सलाह ठूंसने की जगह खुले सवाल — 'तुम्हें क्या लगता है, अब क्या करें?', 'मैं बस सुनूं, या साथ में सोचें?' रिपोर्ट में एक मां का क़िस्सा है जिसका छह साल का बेटा खेल से भगाया गया: उसने न लड़कों को डांटा, न शिकायत की — बस बेटे की बात सुनी. अगली शाम वह बच्चा ख़ुद पार्क लौटा और हफ़्ते भर में उसने अपने दोस्त खोज लिए. मां के शब्दों में — वह सीख गया कि 'मैं मुश्किल चीज़ें कर सकता हूं.' यही एक वाक्य पूरी पूंजी है.

तीसरा क़दम — बस और बाक़ी का फ़र्क़: बच्चे के साथ बैठकर बांटिए कि क्या हमारे हाथ में है और क्या नहीं. बर्थडे की मेहमानों की सूची हमारे हाथ में नहीं; अपनी प्रतिक्रिया हाथ में है — चाहें तो फिर भी कार्ड-तोहफ़ा भेज सकते हैं, चाहें तो उस दिन अपना अलग मज़ेदार कार्यक्रम बना सकते हैं. 'जो हाथ में नहीं, उस पर आंसू सीमित; जो हाथ में है, उस पर ज़ोर' — यह बंटवारा बच्चे को जीवन भर काम देगा.

और अपने लिए भी एक क़दम: अपनी चोट पहले ख़ुद संभालिए. बच्चे के सामने दूसरे परिवार को कोसना, हर रिश्तेदार से क़िस्सा दोहराना — यह बच्चे के घाव को हरा रखता है. आपका शांत रहना उसकी सबसे बड़ी दवा है.

ठुकराए जाने से मज़बूती तक

विशेषज्ञों की एक बात पहली बार में कड़वी लगती है: हम बच्चों के जीवन से ठुकराया जाना मिटाना नहीं चाहते. हर 'ना' से बचाया गया बच्चा पहली असली 'ना' पर बिखरता है. लक्ष्य बहिष्कार रोकना नहीं — बच्चे को वह भीतरी भरोसा देना है कि 'ठीक है, मैं ठीक हूं, मेरी जगह कहीं और है.' एक काउंसलर के शब्दों में — बच्चे को 'असहज के साथ सहज होना' सीखना है.

इसके दो और पाठ हैं जो हम अक्सर भूलते हैं. पहला: दूसरों की पसंद का सम्मान — जैसे हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा 'ना' कह सके, वैसे ही उसे दूसरों की 'ना' पचाना भी सीखना है. हर खेल में हर कोई नहीं खेलता, और यह हमेशा अन्याय नहीं है. दूसरा: हर बहिष्कार बदनीयती नहीं है — बुरा बर्ताव करने वाला बच्चा अक्सर ख़ुद बुरे दिन से गुज़र रहा होता है, और छोटे बच्चों को तो पता ही नहीं होता कि उनकी बात चुभी है. बच्चे को 'ग़लती इंसान से अलग करना' सिखाइए — दोस्ती लंबी चलाने का यही नुस्ख़ा है.

किशोर उम्र में यह सब और नुकीला हो जाता है — किशोर मन ज़्यादा संवेदनशील है, और इंस्टाग्राम उसे वह पार्टी भी दिखा देता है जिसमें उसे नहीं बुलाया गया. पुरानी पीढ़ी को छूटी दावत की ख़बर नहीं लगती थी; इस पीढ़ी को तस्वीरों समेत लगती है. इसीलिए किशोर बच्चे के साथ स्क्रीन-नियमों से ज़्यादा ज़रूरी है रोज़ की वह बातचीत जिसमें दावतों-ग्रुपों-दोस्तियों की बातें बिना जजमेंट के आ सकें.

पहले से बोया हुआ: रिश्ता, मौक़े और हुनर

बहिष्कार के पल की आधी तैयारी उस पल से बहुत पहले होती है. पहला बीज रोज़ की बातचीत है — सिर्फ़ 'होमवर्क हुआ? खाना खाया?' नहीं; 'आज सबसे मज़ेदार क्या था? किस बात पर ग़ुस्सा आया?' जिस घर में भावनाओं की बातें रोज़ होती हैं, वहां बच्चा मुश्किल बात भी लेकर आता है — क्योंकि बच्चे दोस्ती की तकलीफ़ें ख़ुद से नहीं बताते, पूछने वाले को बताते हैं.

दूसरा बीज मौक़े हैं: छोटे बच्चों के लिए अलग-अलग दायरों के बच्चों से खेलने के मौक़े — सोसाइटी के, स्कूल के, रिश्तेदारी के — ताकि एक दरवाज़ा बंद हो तो दूसरे खुले हों. बड़े बच्चों के लिए टीम-खेल यही काम करते हैं. जिस बच्चे के पास दोस्ती की कई ज़मीनें हैं, उसके लिए एक ज़मीन का ठुकराना ज़लज़ला नहीं रहता.

तीसरा बीज हुनर है — और यह सिखाया जा सकता है: शर्मीले बच्चे को बातचीत शुरू करने के वाक्य ('मैं भी खेलूं? मुझे फील्डिंग आती है'), दबंग बच्चे को दूसरों के इशारे पढ़ना, और हर बच्चे को अपनी सीमा शालीनता से कहना — 'मुझे यह खेल अच्छा नहीं लग रहा, मैं दूसरा खेलता हूं.' रानी बनने की उस लड़ाई में (जो हर घर में रोज़ होती है) विशेषज्ञों का सुझाया जवाब कितना सरल है: 'सबको रानी बनना है — तो बारी-बारी कैसे करें?' झगड़े से सहयोग की ओर मोड़ने वाला एक सवाल.

और आख़िरी बीज आप ख़ुद हैं: बच्चा देखता है कि आप अपनी 'ना' कैसे झेलते हैं — जिस मां-पापा को नौकरी-रिश्तेदारी की निराशाओं पर संभलते देखा है, उस बच्चे के पास पहले से एक नक़्शा है.

कब यह 'सामान्य' से आगे है

यह पूरा लेख कभी-कभार के ठुकराए जाने की बात करता है. लकीर वहां खिंचती है जहां बहिष्कार जान-बूझकर, लगातार और ताक़त के फ़र्क़ के साथ हो — वही बदमाशी (bullying) है, और वहां 'बच्चे आपस में सुलझा लेंगे' ग़लत सलाह है. निशान: स्कूल जाने से रोज़ की आनाकानी, पेट-सिर दर्द की सुबहें, नींद-भूख का बदलना, चीज़ें 'खोना', अचानक सहमा या चिड़चिड़ा स्वभाव, ख़ुद को 'सब मुझसे नफ़रत करते हैं' कहना.

ऐसे में क़दम बड़ों के हैं: बच्चे की बात को पूरा दर्ज कीजिए (कब, कौन, कहां), क्लास टीचर से शांत तथ्यों के साथ मिलिए, स्कूल की काउंसलर को साथ लीजिए, और सुधार न हो तो लिखित शिकायत तक जाइए — बच्चे को यह दिखना चाहिए कि बड़ों से मदद मांगना काम करता है. और बच्चे का मन लंबे समय तक भारी रहे — हफ़्तों की उदासी, अकेलापन, 'मैं किसी काम का नहीं' — तो बाल-रोग विशेषज्ञ या चाइल्ड काउंसलर से बात करना उतना ही सामान्य क़दम है जितना बुख़ार में डॉक्टर.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: बर्थडे में पूरी क्लास बुलाई गई, मेरा बच्चा छूट गया. दूसरे मां-बाप से बात करूं? — पूछ सकते हैं — लहजा शिकायत का नहीं, सफ़ाई का हो: 'शायद न्योता छूट गया हो, इसलिए पूछ रही हूं.' कई बार सच में भूल निकलती है. पर जवाब जो भी हो, बच्चे के सामने उस परिवार को मत कोसिए — बच्चे को हाथ में जो है वही दिखाइए: उस दिन का अपना मज़ेदार कार्यक्रम, और चाहे तो फिर भी शुभकामना भेजने का बड़प्पन. दोनों चीज़ें उसे ज़िंदगी भर काम देंगी.

सवाल: मेरा बच्चा ख़ुद दूसरों को खेल से निकालता है — यह भी तो देखना चाहिए? — बिलकुल, और यह पूछना ही अच्छे माता-पिता की निशानी है. उसी शांत तरीक़े से बात कीजिए: 'उसे कैसा लगा होगा जब तुमने मना किया?' — शर्मिंदा किए बिना, भावना की पढ़ाई. साथ में घर का नियम: खुले खेल में जो आए, खेलेगा; 'ना' कहनी हो तो वजह और शालीनता से. दबंग बच्चे को दूसरों के चेहरे पढ़ना सिखाना उतना ही ज़रूरी हुनर है जितना शर्मीले को बोलना.

सवाल: बेटी कहती है 'मेरी कोई दोस्त नहीं' — पर स्कूल से कोई शिकायत नहीं आती. — शिकायत का न आना ठीक होने का सबूत नहीं — अकेलापन शोर नहीं करता. रोज़ की बातचीत में बिना जजमेंट खोदिए: लंच किसके साथ, खेल में कौन, बस में कौन. फिर मौक़े बनाइए — एक-एक बच्चे को घर बुलाना (भीड़ नहीं), साझा रुचि वाली क्लास-टीम. और उसकी बात को हल्का मत कीजिए ('अरे सब तेरी दोस्त हैं!') — जिस बच्चे की भावना नकारी जाती है, वह बताना बंद कर देता है.

सवाल: चचेरे-ममेरे बच्चे हर फ़ंक्शन में मेरे बच्चे को अलग कर देते हैं — रिश्तेदारी में क्या करूं? — घर की राजनीति में सबसे मुश्किल मैदान यही है. उसी क्रम पर टिकिए: पहले अपने बच्चे की भावना ('हां, बुरा लगता है'), फिर हुनर (साथ ले जाने लायक़ खेल-चीज़ जो सबको जोड़े — कैरम, कार्ड, बॉल), और उम्र के फ़र्क़ जैसी असलियतें भी समझाइए — बारह साल वालों का सात साल वाले को हर खेल में न लेना हमेशा बदनीयती नहीं. बड़ों के दख़ल की ज़रूरत तभी जब चिढ़ाना-नीचा दिखाना चले — तब मेज़बानी-रिश्तेदारी से ऊपर आपका बच्चा है.

सवाल: मुझे ख़ुद बचपन का ठुकराया जाना याद है और बच्चे के मामले में मैं ज़रूरत से ज़्यादा भड़क जाता/जाती हूं. — यह पहचान लेना ही आधा इलाज है — विशेषज्ञ इसी को कहते हैं: बच्चे के बहिष्कार पर हमारा अपना पुराना घाव जाग जाता है. भड़कने से पहले की सांस यहां भी काम करती है, और एक सवाल ख़ुद से: 'यह प्रतिक्रिया मेरे बच्चे की ज़रूरत है, या मेरे सात साल के 'मैं' की?' अपना क़िस्सा किसी बड़े से बांटिए, बच्चे के मैदान में मत उतारिए. और यह भारी लगे तो काउंसलर से अपनी बात करना भी परवरिश ही है.

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समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम