
फेफड़ों की रिहर्सल अपने आख़िरी अंक में है — इस हफ़्ते जन्म हो जाए तो ज़्यादातर बच्चे थोड़ी सी मदद से पार लग जाते हैं. इधर आपकी थकान अपने चरम की ओर है — उसका भी इंतज़ाम चाहिए.
महीनों से चल रही साँस की रिहर्सल अब आख़िरी अंक में है. सर्फ़ैक्टेंट की मात्रा उस पड़ाव पर पहुँच रही है जहाँ फेफड़े हवा में खुलकर टिक सकें — चौंतीस के बाद जन्मे ज़्यादातर बच्चों को साँस की थोड़ी-बहुत मदद ही लगती है, और कई को वह भी नहीं.
यह जानकारी तसल्ली के लिए है, ताकि 'अगर जल्दी हो गया तो' वाला डर अपनी सही जगह पर बैठे. पर मक़सद अब भी वही है — पूरे दिन (39-40 सप्ताह) तक भीतर रहना, क्योंकि आख़िरी हफ़्ते दिमाग़-जिगर-चर्बी की भराई के हैं.
आपकी तरफ़ इस हफ़्ते की सबसे सच्ची चीज़ थकान है — पहली तिमाही जैसी, पर वजह उलटी: तब शरीर बना रहा था, अब ढो रहा है. इस थकान से लड़ा नहीं जाता; इसके साथ इंतज़ाम किया जाता है.
बच्चा अब खरबूजे जितना — चवालीस सेंटीमीटर, वज़न सवा दो किलो की ओर. चर्बी अब गालों तक पहुँच गई है — चूसने वाली मांसपेशियों के साथ मिलकर वही 'नवजात वाले गाल' बन रहे हैं.
लड़कों में अंडकोष अब ज़्यादातर नीचे उतर चुके हैं. नाख़ून उँगलियों के सिरे पार कर रहे हैं, और वर्निक्स की परत मोटी हो रही है — जन्म के समय की वह सफ़ेद चिकनाई अब जमा हो रही है.
बच्चे की आँखें अब खुले समय में झपकती-घूमती हैं, और तेज़ रोशनी पर पुतली सिकुड़ती है. सब कुछ 'बाहर' के पहले दिन के लिए तैयार दिखता है — बाक़ी है तो बस वज़न और वक़्त.
टख़नों-पैरों की सूजन अब शाम की पक्की मेहमान है. दिन में दो-तीन बार दस मिनट पैर ऊँचे — कुर्सी पर बैठे-बैठे स्टूल पर ही सही. अँगूठी तंग लगने लगे तो उतारकर सँभाल दीजिए — बाद में उतारना मुश्किल होता है.
थकान का इंतज़ाम अब घर के काम बाँटने से आगे बढ़े — मेहमानों की आवाजाही भी नपे. गोद-भराई के बाद का घर अक्सर मिलने वालों से भरा रहता है; 'आराम का समय' घोषित करना (दोपहर दो से चार दरवाज़ा बंद) कोई बदतमीज़ी नहीं है.
मन अब सपनों में भी प्रसव देखने लगता है — अजीब, डरावने, उलझे सपने इन हफ़्तों की आम बात हैं. वे किसी अनहोनी की ख़बर नहीं, दिमाग़ की तैयारी हैं. किसी से कह देने भर से उनका बोझ आधा हो जाता है.
अब से मुलाक़ातें हर हफ़्ते-दस दिन पर आ जाएँगी — कैलेंडर उसी हिसाब से. हर मुलाक़ात में बीपी-पेशाब-वज़न के साथ अब पेट की नाप और बच्चे की करवट भी जाँची जाएगी.
सिज़ेरियन की सूरत में क्या-क्या होगा — यह एक बार डॉक्टर से समझ लीजिए, चाहे योजना सामान्य प्रसव की हो. तीन सवाल: किन हालात में सिज़ेरियन का फ़ैसला होगा, उसमें साथ कौन रह सकता है, और उसके बाद अस्पताल में कितने दिन. जानकारी डर घटाती है — बढ़ाती नहीं.
स्तनपान की व्यावहारिक तैयारी: एक फ़ीडिंग-फ्रेंडली कपड़ों का जोड़ा (सामने खुलने वाले), और घर में वह कुर्सी/कोना तय जहाँ बैठकर पिलाना आरामदेह हो — कमर के पीछे तकिया, हाथ के नीचे सहारा, पास में पानी की बोतल.
नवजात के लिए घर की हवा भी देख लीजिए — जिस कमरे में बच्चा रहेगा वहाँ धूम्रपान बिल्कुल नहीं (घर में कहीं भी नहीं तो सबसे अच्छा), मच्छरों का इंतज़ाम जाली/मच्छरदानी से (नवजात पर क्रीम-कॉइल नहीं), और सर्दी के मौसम में अंगीठी-हीटर की हवा का रास्ता.
इस सप्ताह की ज़रूरी बातें एक जगह. आपकी सेहत के हिसाब से डॉक्टर इनमें बदलाव बता सकते हैं.
| बात | चौंतीसवें सप्ताह में |
|---|---|
| मुख्य घटना | फेफड़े लगभग तैयार — सर्फ़ैक्टेंट पूरा होने को |
| बच्चे का आकार | 44 सेंटीमीटर, ~2.2 किलो; गाल भर रहे हैं |
| आपके मुमकिन लक्षण | गहरी थकान, शाम की सूजन, प्रसव के सपने |
| मुलाक़ातें | अब हर हफ़्ते-दस दिन |
| समझ लीजिए | सिज़ेरियन की सूरत के तीन सवाल |
| घर में | फ़ीडिंग का कोना; धुआँ-मच्छर का इंतज़ाम |
| रोज़ जारी | किक-गिनती — अब पहले से भी ज़्यादा ज़रूरी |
हलचल पहली पंक्ति — कम लगे तो उसी समय फ़ोन; यह वाक्य अब हर हफ़्ते पहला ही रहेगा. प्रसव-लक्षण 37 से पहले — पानी, नियमित दर्द, ख़ून — उसी समय अस्पताल.
सूजन की कसौटी फिर दोहरा लें: पैरों की शाम वाली सूजन सामान्य; चेहरे-हाथों की, अचानक, सुबह भी बनी रहने वाली सूजन — ख़ासकर सिरदर्द या चमक के साथ — उसी समय बीपी. तीसरी तिमाही का प्री-एक्लैम्प्सिया तेज़ चलता है; उसकी पकड़ जल्दी होनी चाहिए.
यह लेख सिर्फ़ सामान्य जानकारी के लिए है. यह व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह की जगह नहीं ले सकता. आपकी सेहत, चल रही दवाएँ और पिछली गर्भावस्थाओं का अनुभव देखकर सलाह वही दे सकते हैं — आपके स्त्री-रोग विशेषज्ञ या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर.
आख़िरी माहवारी शुरू होने का पहला दिन और चक्र की लंबाई डालें — प्रसव की अनुमानित तारीख़, आज कौन सा सप्ताह चल रहा है और एनॉमली स्कैन कब कराना है, सब यहीं दिखेगा.
यह सिर्फ़ अनुमान है — ज़्यादातर बच्चे ठीक उसी तारीख़ पर पैदा नहीं होते. पहले तीन महीनों में हुआ स्कैन इससे सटीक तारीख़ बताता है; आख़िर में आपके डॉक्टर जो कहें, वही सही.
सवाल: बच्चे की हलचल अब 'कम जगह में ज़्यादा ज़ोर' वाली है — गिनती में क्या बदलेगा? — कुछ नहीं. ढंग बदलता है — लात की जगह धक्का-लहर — पर गिनती वही दस-में-दो-घंटे. 'जगह कम है इसलिए हलचल कम होगी' वाली बात ग़लत है और ख़तरनाक भी; मात्रा घटना हमेशा जाँच की चीज़ है.
सवाल: सोते-सोते पीठ के बल आ जाती हूँ, नींद खुलती है तो घबरा जाती हूँ — नुक़सान हो गया होगा? — नहीं. शरीर ख़ुद जगा देता है — यही उसका इंतज़ाम है. करवट लेकर फिर सो जाइए. तकिये का सहारा पीठ के पीछे लगा लें तो पलटना कम होगा.
सवाल: खाना ज़रा सा खाते ही पेट भर जाता है — बच्चे को कम तो नहीं पड़ रहा? — जगह की तंगी है, ख़ुराक की नहीं. दिन को पाँच-छह छोटे खानों में बाँट लीजिए — बच्चे का हिसाब दिन भर के जोड़ से चलता है, एक बार की थाली से नहीं.
सवाल: चलते-चलते पेट के निचले हिस्से में अचानक बिजली-सी चुभती है — रुक जाती हूँ. यह क्या है? — वही 'लाइटनिंग क्रॉच' — बच्चे का सिर नसों पर टिक जाता है. पल भर की चुभन, करवट-मुद्रा बदलने से जाती है — ख़तरा नहीं. लगातार दर्द या नियमित कसाव इसकी शक्ल नहीं है — फ़र्क़ याद रहे.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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