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पॉटी ट्रेनिंग कैसे कराएं: तैयारी के संकेत, पहले हफ्ते की योजना और हादसों का सही जवाब

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पॉटी ट्रेनिंग कैसे कराएं: तैयारी के संकेत, पहले हफ्ते की योजना और हादसों का सही जवाब

नानी के घर दिवाली वाली रात से लेकर स्कूल एडमिशन के दबाव तक — पॉटी ट्रेनिंग को जंग बनाए बिना, 45-60 मिनट के प्रॉम्प्ट और सात दिन की एक साफ योजना से आदत में बदलने का तरीका।

दिवाली की रात, नानी का नया कालीन और ढाई साल की मीरा

घर भरा हुआ है, दीये जल चुके हैं, और ढाई साल की मीरा नए फ्रॉक में मामा की गोद में है। तभी वह चुपचाप खड़ी हो जाती है और नानी के नए कालीन पर गीला घेरा फैलने लगता है। कमरे में तीन तरह की आवाज़ें एक साथ उठती हैं — 'अरे! कालीन!', 'इतनी बड़ी हो गई और अब तक नहीं सीखा?' और सबसे भारी वाली, 'मेरी बेटी तो दो साल में ही सीख गई थी।' मीरा की मां का चेहरा लाल है, और मीरा की आंखें भर आई हैं।

उस पल में जो सबसे कम मायने रखता है, वह है कालीन। जो सबसे ज़्यादा मायने रखता है, वह है अगले तीस सेकंड में मीरा क्या सीखती है — यह कि शरीर की गड़बड़ी पर शर्म मिलती है, या यह कि गड़बड़ी हो जाती है और मिलकर साफ कर ली जाती है। पहले वाले रास्ते पर बच्चे पॉटी रोकना सीख जाते हैं, और वहीं से कब्ज़ और महीनों लंबी लड़ाई शुरू होती है।

पॉटी ट्रेनिंग कोई परीक्षा नहीं है जिसमें जल्दी पास होना गर्व की बात हो। यह चलना और बोलना जैसी एक विकास की सीढ़ी है, जिसमें शरीर की तैयारी, मौसम, घर के माहौल और आपके धैर्य — चारों का हिस्सा है। नीचे वही तरीका है जो ज़्यादातर भारतीय घरों में, बिना डांट के, 1 से 3 हफ्ते में काम करता है।

उम्र नहीं, तैयारी के छह संकेत देखिए

ज़्यादातर बच्चे 18 महीने से 3 साल के बीच तैयार होते हैं, और औसत भारतीय घर में 2 से 2.5 साल के आसपास शुरुआत सबसे आसान पड़ती है। पर तारीख से ज़्यादा ये छह संकेत मायने रखते हैं: (1) डायपर लगातार 2 घंटे सूखा रहता है या दोपहर की नींद के बाद सूखा मिलता है, (2) गीले डायपर में बच्चा असहज होता है और खींचता है, (3) पॉटी आने पर वह कोने में जाकर या पर्दे के पीछे छिपकर करता है, (4) 'यह उठाकर टोकरी में डाल दो' जैसे दो-कदम वाले निर्देश समझ जाता है, (5) खुद पजामा नीचे-ऊपर करने की कोशिश करता है, और (6) सहारे से सीढ़ी चढ़-उतर लेता है।

इनमें से चार संकेत हों तो शुरू कीजिए। एक-दो ही हों तो 3-4 हफ्ते रुक जाइए — जल्दी शुरू करने से प्रक्रिया छोटी नहीं होती, बस लंबी और झगड़ालू हो जाती है। जिन घरों में 15-16 महीने पर शुरू किया जाता है, वहां अक्सर 'ट्रेनिंग' दरअसल मां की होती है: मां को समय याद रहता है, बच्चे को नहीं।

शुरू करने के लिए गलत समय भी होते हैं: छोटा भाई-बहन आने वाला हो, घर बदल रहा हो, स्कूल शुरू होने वाला हो, या बच्चा बीमार हो। इनमें से कुछ चल रहा है तो 4-6 हफ्ते टाल दीजिए। और मौसम का सीधा फायदा उठाइए — गर्मी में कम कपड़े होते हैं, कपड़े जल्दी सूखते हैं, और बच्चा नीचे तक जल्दी पहुंच जाता है।

शुरुआत: पहले जान-पहचान, फिर 45-60 मिनट के प्रॉम्प्ट

पॉटी सीट घर लाकर पहले हफ्ता भर सिर्फ दोस्ती कराइए। बच्चा कपड़ों समेत उस पर बैठे, अपनी गुड़िया बिठाए, वहीं बैठकर किताब देखे। उसे बाथरूम में आपके साथ आने दीजिए और शब्द तय कर लीजिए — 'सूसू' और 'पॉटी' — जो पूरा परिवार, आया और दादी सब एक जैसा बोलें। अलग-अलग शब्द बच्चे को उलझाते हैं।

असली अभ्यास शुरू हो तो घड़ी से चलिए: उठते ही, हर खाने के 15-20 मिनट बाद, नहाने से पहले, बाहर निकलने से पहले और सोने से पहले — और बाकी समय हर 45-60 मिनट पर। बिठाने का समय 3-5 मिनट से ज़्यादा नहीं; कुछ न हो तो 'कोई बात नहीं, थोड़ी देर बाद फिर आएंगे' कहकर उठा दीजिए। ज़बरदस्ती बिठाए रखना सबसे तेज़ तरीका है बच्चे को पॉटी सीट से नफरत कराने का।

पैरों के नीचे स्टूल ज़रूर रखिए। लटकते पैरों से पेट पर ज़ोर नहीं लगता; घुटने कूल्हों से थोड़ा ऊंचे हों तो मल आसानी से निकलता है — यही एक छोटी चीज़ कब्ज़ वाले कई बच्चों में फर्क डाल देती है। और सफलता पर तारीफ ठोस रखिए: 'वाह! तुमने खुद बताया और पॉटी में किया' — 'गुड बॉय' जैसी अधूरी तारीफ से बेहतर।

हादसे, पीछे लौटना और रात की ट्रेनिंग

हादसे होंगे — पहले दो हफ्तों में रोज़ 2-4 तक सामान्य हैं। जवाब हर बार एक जैसा और शांत रखिए, यही स्क्रिप्ट याद कर लीजिए: 'कोई बात नहीं, सूसू निकल गई। पॉटी बताती है कि उसे बाहर आना है। चलो साथ में साफ करते हैं, और अगली बार हम पॉटी तक भागेंगे।' न डांट, न 'छी', न भाई-बहन के सामने मज़ाक, न गीले कपड़े में देर तक बिठाना। शर्मिंदगी बच्चों को पॉटी रोकना सिखाती है, बताना नहीं।

अगर बच्चा तीन दिन से लगातार मना कर रहा है, चीख रहा है या पॉटी रोक रहा है, तो लड़ाई मत बढ़ाइए — 2-3 हफ्ते के लिए डायपर पर वापस जाइए और बिना कोई टिप्पणी किए दोबारा शुरू कीजिए। भाई-बहन का जन्म, नानी के घर लंबा रुकना या स्कूल शुरू होना — इन बदलावों पर सीखा हुआ बच्चा भी कुछ हफ्तों के लिए पीछे लौट सकता है। यह नाकामी नहीं, तनाव का सामान्य असर है।

रात की ट्रेनिंग दिन की ट्रेनिंग के महीनों बाद आती है, और यह इच्छा से नहीं, शरीर के एक हार्मोन से चलती है। 3 से 4 साल तक रात का डायपर पूरी तरह सामान्य है, और 5 साल तक भी कुछ बच्चों में गीलापन रहता है। सोने से 1-1.5 घंटे पहले पानी-दूध कम कर दीजिए, सोने से ठीक पहले सूसू करा दीजिए, गद्दे पर वॉटरप्रूफ शीट डाल दीजिए — और लगातार 7-10 रातें डायपर सूखा मिलने पर ही डायपर हटाइए।

पहले हफ्ते की दिन-ब-दिन योजना और सामान की लिस्ट

शुरू करने से पहले यह सामान जुटा लीजिए: फर्श वाली एक छोटी पॉटी (बच्चे को इसमें ज़्यादा भरोसा होता है) और बड़ी सीट पर लगने वाली एक रिंग, पैरों के लिए एक स्टूल, 8-10 सूती चड्डियां (बच्चे को खुद रंग चुनने दें), 3-4 जोड़ी ढीले पजामे जो एक झटके में नीचे हों, गद्दे और कार सीट के लिए वॉटरप्रूफ शीट, फर्श का क्लीनर और पुराने तौलिये, बाहर जाने के बैग में एक अतिरिक्त सेट कपड़े, और एक साधारण स्टिकर चार्ट।

दिन 1-2 (लंबा वीकेंड सबसे अच्छा): सुबह 8 से शाम 6 तक घर पर बिना डायपर, बस चड्डी। हर 45 मिनट पर पॉटी ले जाइए, बीच-बीच में खूब पानी और तरल पिलाइए ताकि मौके ज़्यादा मिलें। दिन 3-4: प्रॉम्प्ट हर 60 मिनट कर दीजिए और बच्चे से पूछने के बजाय 'चलो, पॉटी का समय हो गया' कहकर ले जाइए — 'सूसू आई है?' का जवाब लगभग हमेशा 'नहीं' होता है। दिन 5-6: 20-30 मिनट के लिए घर के बाहर जाइए (पार्क, दुकान), जाने से ठीक पहले पॉटी, और बैग में अतिरिक्त कपड़े। दिन 7: दिन की नींद के दौरान भी बिना डायपर आज़माइए, बशर्ते पिछले तीन दिन नींद के बाद चड्डी सूखी मिली हो।

पूरे हफ्ते डायपर सिर्फ रात के लिए और लंबी यात्रा के लिए। पुल-अप पैंट दिन में पहनाने से बच्चे को गीलेपन का अहसास नहीं होता, इसलिए सीखना धीमा पड़ता है। घर के सब लोगों — दादी, ससुराल, आया, ड्राइवर — को एक ही निर्देश दे दीजिए: वही शब्द, वही शांत जवाब, कोई तुलना नहीं। डे-केयर या प्ले-स्कूल जाता है तो शुरू करने से पहले टीचर को बता दीजिए और उनसे भी वही समय-सारणी चलवाइए।

दादी-नानी कहती हैं vs आज का विज्ञान

'हमने तो 8 महीने में ही सिखा दिया था, सू-सू की आवाज़ करके' — यहां जो सीखा जाता है वह बच्चे का नियंत्रण नहीं, बड़ों की टाइमिंग है। असली मूत्राशय नियंत्रण 18-24 महीने से पहले शारीरिक रूप से संभव ही नहीं, क्योंकि उससे पहले वे नसें पूरी तरह विकसित नहीं होतीं। 'जल्दी सिखाना गर्व की बात है' वाली सोच का सबसे आम नतीजा है ढाई-तीन साल पर कब्ज़, मल रोकना और लंबी लड़ाई।

'डांटोगे नहीं तो कभी नहीं सीखेगा' और 'गीली चड्डी पहनाए रखो, खुद शर्म आएगी' — दोनों उलटे पड़ते हैं। डर में बच्चा शरीर के संकेत पहचानना नहीं, संकेत दबाना सीखता है। इसी तरह 'पड़ोस का बच्चा तो सीख गया' वाली तुलना से किसी का मूत्राशय जल्दी परिपक्व नहीं होता — बस मां की चिंता बढ़ती है, जो बच्चे तक पहुंच जाती है।

बड़ों की तीन बातें एकदम सही हैं, और उन्हीं पर यह पूरी योजना टिकी है: तय समय पर बिठाना (रूटीन), खाने के तुरंत बाद बिठाना — क्योंकि खाने के बाद आंतें सचमुच सक्रिय होती हैं — और गर्मियों में घर पर कम कपड़ों में खुला छोड़ना। बच्चे को बहलाने के लिए पॉटी पर कहानी सुनाना भी उनका ही तरीका है, और वह मोबाइल पकड़ा देने से हर हाल में बेहतर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: स्कूल कह रहा है कि एडमिशन के लिए बच्चा पॉटी ट्रेंड होना चाहिए, पर वह तैयार नहीं लगता — क्या करें? — स्कूल से साफ बात कीजिए; ज़्यादातर प्ले-स्कूल अतिरिक्त कपड़ों के साथ हादसे संभाल लेते हैं। दाखिले की तारीख से कम से कम 6-8 हफ्ते पहले शुरू कीजिए ताकि जल्दबाज़ी न हो, और स्कूल के पहले महीने में हादसे बढ़ें तो उसे सामान्य मानिए।

सवाल: बेटे को बैठकर सिखाएं या खड़े होकर? — पहले बैठकर, दोनों कामों के लिए। खड़े होकर सूसू करना बाद में सिखाइए, वरना शुरुआत में मल के लिए बैठना मुश्किल हो जाता है। घर के किसी पुरुष सदस्य के साथ जाने देना इस बदलाव को सबसे आसान बना देता है।

सवाल: बच्चा सूसू तो पॉटी में करता है, पर मल के लिए डायपर मांगता है — क्या यह ठीक है? — यह बहुत आम है और अक्सर डर या पहले कभी हुए दर्द से जुड़ा होता है। डायपर देने से मना मत कीजिए, बल्कि उसे डायपर पहनकर बाथरूम में ही करने दीजिए, फिर धीरे-धीरे पॉटी के पास, फिर पॉटी पर डायपर बिछाकर। साथ में पानी, फल और रेशेदार खाना बढ़ाइए ताकि मल नरम रहे।

सवाल: डॉक्टर के पास कब जाएं? — सूसू में जलन या रोना, बार-बार थोड़ा-थोड़ा सूसू, 3 दिन से मल न होना या मल में खून, अचानक सीखा हुआ बच्चा दोबारा दिन में गीला करने लगे, या 4 साल के बाद भी दिन में लगातार हादसे हों — इन सब में देर मत कीजिए। कई बार पीछे हटने की वजह मूत्र संक्रमण या कब्ज़ जैसी शारीरिक होती है, और उसका इलाज आसान है।

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समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम