
चुसनी बच्चे को चैन देती है और माँ-बाप को नींद — फिर एक दिन वही चुसनी दाँतों, बोली और नींद की अटक बन जाती है. सही समय पर, सही तरीक़े से विदाई हो तो यह जंग नहीं, एक हफ़्ते की कहानी है.
चूसना शिशु की बुनियादी ज़रूरत है — भूख से अलग, ख़ालिस चैन के लिए. पैसिफ़ायर उसी ज़रूरत का साफ़-सुथरा जवाब है, और पहले महीनों में उसके असली फ़ायदे हैं: रोते बच्चे को शांति, सोते समय सहारा — और सोते समय चुसनी SIDS (नींद में अचानक मृत्यु) का जोखिम घटाने से भी जुड़ी है. इसलिए 'चुसनी दी ही क्यों' वाला अपराध-बोध बेकार है.
स्तनपान वाले बच्चे में चुसनी तब शुरू कीजिए जब दूध की पकड़ जम जाए — आम तौर पर तीन-चार हफ़्ते बाद — ताकि निप्पल-कन्फ़्यूज़न न हो. और शुरू से दो नियम: चुसनी शहद-चीनी में डुबोकर कभी नहीं (दाँत सड़ने का पक्का नुस्ख़ा), और डोरी से गले में लटकाकर कभी नहीं (घुटन का ख़तरा) — क्लिप वाली छोटी चेन ही इस्तेमाल हो.
समस्या चुसनी नहीं, उसकी उम्र है. जो चीज़ छह महीने के बच्चे के लिए सहारा है, वही तीन साल के दाँतों-बोली के लिए अड़चन बनने लगती है. इसलिए यह लेख विदाई के बारे में है — सही समय पर, सही तरीक़े से.
छह महीने से एक साल: कान के संक्रमण बार-बार हों तो डॉक्टर चुसनी घटाने-रोकने की सलाह दे सकते हैं — लगातार चूसना कान की नली पर असर डालता है. वैसे भी छह महीने के बाद चुसनी का SIDS वाला फ़ायदा पीछे छूट जाता है — यानी अब वह ज़रूरत नहीं, आदत है.
एक से दो साल: छुड़ाने की सबसे आसान खिड़की. आदत अभी गहरी नहीं, ज़िद की उम्र शुरू नहीं हुई, और बच्चा हफ़्ते भर में भूल जाता है. हो सके तो दूसरा जन्मदिन आने से पहले विदाई कर दीजिए.
दो से तीन साल: अब भी ठीक समय है, पर तरीक़ा चाहिए — बच्चा समझने लगा है, इसलिए समझाने वाले तरीक़े (नीचे) काम करते हैं. तीन साल के बाद: अब टालिए मत. लगातार चूसने का असर दाँतों की क़तार (आगे के दाँत बाहर, खुला काट), तालू की बनावट और कभी-कभी बोली की साफ़ता पर दिखने लगता है. अच्छी ख़बर: दूध के दाँतों के दौर में छूट जाए तो ज़्यादातर बदलाव खुद ठीक हो जाते हैं.
समय चुनने की समझदारी: बड़े बदलावों के बीच विदाई मत रखिए — नया भाई-बहन, नया घर, स्कूल की शुरुआत, बीमारी. एक उथल-पुथल पर दूसरी मत चढ़ाइए.
सबसे कोमल रास्ता: पहले चुसनी को सिर्फ़ सोने के समय तक सीमित कीजिए. नियम साफ़ बोलिए: 'चुसनी अब सिर्फ़ बिस्तर में रहती है.' दिन में माँगे तो ध्यान बँटाइए — खेल, पानी, गोद. दिन की आदत छूटने में आम तौर पर एक-दो हफ़्ते लगते हैं.
फिर झपकी से हटाइए, आख़िर में रात से. रात छुड़ाने की तरकीब: सोने की रस्म को बाक़ी चीज़ों से भारी कीजिए — कहानी लंबी, लोरी, पीठ पर हाथ — ताकि नींद का सहारा चुसनी से हटकर रस्म पर आ जाए. शुरू की तीन-चार रातें बेचैन होंगी; यह वापसी का संकेत नहीं, आदत टूटने की आवाज़ है.
इस रास्ते में एक ही ग़लती भारी पड़ती है: 'बस आज दे देते हैं.' रो-रोकर मिली चुसनी बच्चे को सिखाती है कि रोना लंबा हो तो नियम टूटता है — और अगली बार रोना लंबा ही होगा. नियम बदलिए मत; गोद-थपकी-कहानी जितनी चाहिए, दीजिए.
दो-तीन साल के समझदार बच्चे के लिए 'अचानक ग़ायब' से बेहतर है 'सम्मान से विदा'. तरीक़े कई हैं, जड़ एक: बच्चा ख़ुद विदाई में शामिल हो. 'पैसिफ़ायर परी' रात में चुसनियाँ ले जाती है और तकिये के नीचे तोहफ़ा छोड़ती है; या सब चुसनियाँ मिलकर किसी 'नन्हे बच्चे को दान' की जाती हैं ('अब तुम बड़े हो गए, किसी छोटे बच्चे को चाहिए'); या चुसनी के बदले खिलौने की दुकान में अदला-बदली.
विदाई से पहले तीन-चार दिन की तैयारी: 'रविवार को चुसनी परी आएगी' — गिनती के दिन बच्चे को तैयार करते हैं. विदाई के बाद घर में एक भी चुसनी बची न रहे — दराज़ में मिली एक पुरानी चुसनी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है.
अगले हफ़्ते के लिए तैयार रहिए: सोते समय माँगेगा, कभी रोएगा. जवाब हमदर्दी + याद: 'चुसनी परी ले गई न — तुमने ही तो दी थी. आओ, कहानी पढ़ते हैं.' ज़्यादातर बच्चे पाँच-सात दिन में नई लय पकड़ लेते हैं. नए सहारे को जगह दीजिए — कोई नरम खिलौना, ख़ास कंबल — मुँह की जगह हाथ का सहारा बिलकुल ठीक सौदा है.
क्या न करें: चुसनी पर कड़वा-तीखा लगाना (भरोसा तोड़ता है, और चीज़ें मुँह में डालने वाले बच्चे के लिए ठीक नहीं), शर्मिंदा करना ('इतना बड़ा होकर चुसनी!'), और दूसरों के सामने मज़ाक़. आदत शर्म से नहीं छूटती — शर्म बस छिपकर चूसना सिखाती है.
इन हालात में बाल-रोग विशेषज्ञ या दाँतों के डॉक्टर से बात कीजिए: चार साल के बाद भी चुसनी/अंगूठा न छूटे; आगे के दाँत साफ़ बाहर की ओर जाते दिखें या ऊपर-नीचे के दाँत मिलते न दिखें (खुला काट); बोली में साफ़ता की कमी जो चूसने से जुड़ी लगे; या बार-बार कान का संक्रमण जिसमें डॉक्टर चुसनी का ज़िक्र करें.
पहला दाँत आने के बाद साल में एक बार दाँतों की जाँच वैसे भी अच्छी आदत है — चुसनी-अंगूठे का असर वहीं सबसे पहले पकड़ा जाता है.
यह लेख सामान्य जानकारी है, चिकित्सा सलाह नहीं — यह आपके डॉक्टर की निजी सलाह की जगह नहीं ले सकता. अपने या अपने बच्चे की सेहत से जुड़ा कोई भी फ़ैसला डॉक्टर से पूछकर ही लें.
सवाल: चुसनी छुड़ाई तो बच्चे ने अंगूठा पकड़ लिया. यह तो और बुरा हुआ? — थोड़ा-सा हाँ — चुसनी परी ले जा सकती है, अंगूठा हमेशा साथ है. पर घबराइए मत: विदाई के हफ़्तों में थोड़ा अंगूठा आम है और ज़्यादातर बच्चों में खुद छूट जाता है. सहारे की ज़रूरत को दूसरी चीज़ पर मोड़िए — नरम खिलौना, कंबल — और अंगूठा टिक जाए (ख़ासकर चार साल के पास) तो वही उम्र-नियम उस पर भी लागू कीजिए.
सवाल: रात में चुसनी गिरते ही बच्चा जागकर रोता है — रात में दस बार लगानी पड़ती है. — यह चुसनी छुड़ाने का सबसे बड़ा इशारा है: बच्चे की नींद का पूरा सहारा चुसनी पर टिक गया है. रात-रात भर चुसनी ढूँढ़ना जितना आपको थका रहा है, विदाई की एक कठिन हफ़्ता उससे सस्ता सौदा है. विदाई के बाद बच्चा नींद के बीच के जागरण ख़ुद सँभालना सीखता है — यही तो मक़सद था.
सवाल: दादी कहती हैं शहद लगाकर चुसनी दो, बच्चा चुप रहेगा. — यह वाली परंपरा मत मानिए: एक साल से छोटे बच्चे के लिए शहद वैसे भी वर्जित है (बोटुलिज़्म का ख़तरा), और किसी भी उम्र में मीठे में डूबी चुसनी दाँत सड़ाने का सबसे तेज़ रास्ता है. चुसनी हमेशा सादी — और यह बात प्यार से घर के सब बड़ों तक पहुँचे.
सवाल: क्या चुसनी से दाँत टेढ़े हो ही जाते हैं? — 'हो ही जाते हैं' नहीं — असर चूसने की उम्र, ज़ोर और घंटों पर टिका है. दो-ढाई साल तक छूटी चुसनी दाँतों पर आम तौर पर कोई स्थायी निशान नहीं छोड़ती. लंबा (तीन-चार साल के पार), दिन-रात का, ज़ोरदार चूसना ही वह चीज़ है जो काट और तालू की बनावट बदलती है — और तभी दाँतों के डॉक्टर की ज़रूरत पड़ती है.
सवाल: जुड़वाँ हैं — एक की चुसनी छुड़ाओ तो दूसरे की देखकर फिर माँगता है. — जुड़वाँ (या छोटे भाई-बहन) में विदाई एक साथ ही करनी पड़ती है — वरना घर में चुसनी मौजूद है, और मौजूद चुसनी माँगी जाएगी. एक ही दिन, एक ही समारोह, दोनों के तोहफ़े. छोटा शिशु घर में हो तो उसकी चुसनियाँ बड़े की नज़र-पहुँच से बाहर रखिए और बड़े को उसका 'बड़ा होने' वाला किरदार दीजिए — 'यह तो बेबी की है, तुम तो अब कहानी वाले हो.'
इस पन्ने का हर चिकित्सकीय आँकड़ा नीचे दी गई गाइडलाइनों से लिया गया है. आपके डॉक्टर की बात अलग हो तो पूछिए कि वे कौन-सी गाइडलाइन मानते हैं.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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