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शिशु की मालिश: फायदे, सही तरीका, कौन सा तेल और किन गलतियों से बचें

शिशु देखभाल · theAsianparent · अपडेट किया गया

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शिशु की मालिश: फायदे, सही तरीका, कौन सा तेल और किन गलतियों से बचें

छत की धूप, सरसों तेल की कटोरी और दाई के हाथ — इस पुरानी परंपरा में क्या सचमुच काम करता है, कितनी देर, किस दबाव से, और वो चार चीज़ें जो कभी नहीं करनी चाहिए।

सुबह दस बजे, छत पर बिछी चादर

सुबह के करीब दस बजे हैं, छत पर पुरानी चादर बिछी है, कटोरी में तेल रखा है और दादी बच्चे को अपनी दोनों टांगों पर लिटाकर मालिश शुरू करती हैं। पड़ोस की दाई हफ्ते के 300-500 रुपये लेकर यही काम करने आती है। भारत में शिशु की मालिश कोई फैशन नहीं, रोज़ की दिनचर्या है — और इसके बड़े हिस्से को आज का विज्ञान भी सही ठहराता है, बस कुछ हिस्सों में सुधार चाहिए।

सबसे मज़बूत सबूत समय से पहले जन्मे और कम वज़न वाले शिशुओं में मिले हैं: नियमित तेल मालिश से उनका रोज़ का वज़न बेहतर बढ़ता है, त्वचा की सुरक्षा परत मज़बूत होती है और अस्पताल के दिन कम होते हैं। पूरे समय पर जन्मे शिशुओं में भी मालिश के बाद नींद लंबी और गहरी होती है, रोने का समय घटता है और पेट में बनी गैस निकलने में मदद मिलती है।

सबसे बड़ा फायदा वो है जो किसी मशीन पर नहीं नापा जा सकता — स्पर्श से बनने वाला जुड़ाव। मालिश के 10-15 मिनट में आंखों का मिलना, नाम लेकर बात करना और शिशु का जवाब में हाथ-पैर चलाना उसके भावनात्मक विकास को पोषण देता है। इसीलिए यह सिर्फ दादी या दाई का काम नहीं; पिता के लिए भी यह दिन का सबसे अच्छा दस मिनट बन सकता है।

सही तरीका: कदम दर कदम

समय ऐसा चुनें जब शिशु जागा हो और भूखा न हो — दूध पिलाने के 30 से 45 मिनट बाद सबसे अच्छा रहता है, वरना उल्टी हो सकती है। कमरा 26-28 डिग्री गर्म हो, पंखा या एसी सीधे शिशु पर न पड़े, हाथ की अंगूठी-चूड़ी उतार दें और नाखून कटे हों। कुल 10 से 15 मिनट काफी हैं; नवजात के लिए 5 मिनट से शुरू करें। तेल पहले हथेलियों में रगड़कर गुनगुना करें, सीधे शिशु पर न डालें।

क्रम यह रखें: पहले टांगें और तलवे (नीचे से ऊपर की ओर लंबे स्ट्रोक), फिर बांहें और हथेलियां, फिर छाती पर बीच से बाहर की ओर, फिर पेट पर नाभि के चारों ओर घड़ी की दिशा में हल्के गोल हाथ (गैस निकलने में यही सबसे मददगार है), फिर पीठ पर गर्दन से कमर तक। चेहरे और सिर पर सिर्फ हल्का सा, तालु यानी नरम हिस्से पर कोई दबाव नहीं; दबाव इतना कि आप उसे अपनी बंद पलक पर सह सकें। शिशु अकड़े या रोने लगे तो रुक जाइए; ठूंठ गिरने तक पेट के आसपास मालिश नहीं करनी, और 10-15 मिनट बाद नहलाकर तुरंत कपड़े पहना दें।

कौन सा तेल — नारियल, तिल या सरसों?

नारियल का तेल आज सबसे सुरक्षित माना जाने वाला विकल्प है — हल्का, जल्दी सोख लिया जाने वाला, और अध्ययनों में शिशु की त्वचा की नमी बनाए रखने में सबसे अच्छा पाया गया, खासकर कम वज़न वाले शिशुओं में। तिल का तेल उत्तर और पश्चिम भारत में सर्दियों में लोकप्रिय है और आम तौर पर ठीक चलता है। सरसों का तेल सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है, लेकिन कुछ अध्ययनों में यह नाज़ुक त्वचा की सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाता और जलन पैदा करता पाया गया — नवजात के लिए नारियल या तिल बेहतर विकल्प है।

कोई भी नया तेल शुरू करने से पहले पैच टेस्ट कीजिए: बांह के भीतरी हिस्से पर सिक्के जितनी जगह लगाइए और 24 घंटे देखिए; लाली, दाने या सूजन दिखे तो वह तेल न इस्तेमाल करें। खुशबू वाले या खुले सस्ते तेल से बचें, और घर में किसी को बादाम या मूंगफली से एलर्जी रही हो तो वो तेल शिशु पर न आज़माएं। टैल्कम पाउडर न लगाएं — उसके बारीक कण फेफड़ों तक जा सकते हैं। तेल की मात्रा कम रखें, एक बार में एक-दो चम्मच काफी है; ज़्यादा तेल से रोमछिद्र बंद होकर दाने निकल आते हैं। एक्ज़िमा या बहुत सूखी त्वचा हो तो तेल डॉक्टर से पूछकर चुनें।

रोज़ का शेड्यूल और दाई को क्या बताना है

एक सीधा दिनचर्या नमूना: सुबह 9-10 बजे शिशु जागा और शांत हो तो 10-15 मिनट की मालिश, फिर 5-10 मिनट का स्नान, फिर दूध, फिर लंबी नींद। सर्दियों में यही क्रम धूप वाले कमरे में करें — सुबह 8 से 10 बजे के बीच 10-15 मिनट की हल्की धूप विटामिन-डी के लिए काफी है, आंखों को बचाकर और तेज़ दोपहर की धूप से दूर रहकर। मालिश रोज़ हो सकती है, नहलाना हफ्ते में 2-3 बार पर्याप्त है।

दाई या जापा रखते हैं तो पहले दिन ही चार बातें साफ कह दीजिए: नाक या कान में तेल नहीं डालना, शिशु को उल्टा लटकाना या झटके से हाथ-पैर खींचना नहीं, सिर के नरम हिस्से पर दबाव नहीं, और नाभि का ठूंठ गिरने तक उस पर कुछ भी नहीं लगाना। शुरू करने से पहले हाथ धुलवाइए और पहले दो-तीन दिन खुद पास बैठकर देखिए। मालिश इन दिनों टालें: बुखार या बीमारी में, दस्त-उल्टी में, टीका लगे उसी दिन इंजेक्शन वाली जांघ पर, और त्वचा पर घाव या तेज़ दाने होने पर।

दादी-नानी कहती हैं vs डॉक्टर कहते हैं

दादी: रोज़ नाक दबाओगे तो नाक तीखी बनेगी, और सिर को गोल-गोल दबाकर शक्ल सुधर जाएगी। डॉक्टर: नाक और चेहरे की बनावट पूरी तरह जीन तय करते हैं। नवजात की खोपड़ी की हड्डियां अभी जुड़ी नहीं होतीं, इसलिए दबाव से फायदा नहीं, चोट का जोखिम है। सिर पीछे से चपटा न हो इसके लिए सही तरीका है सुलाते समय सिर की दिशा बदलते रहना और जागते हुए रोज़ थोड़ा टमी टाइम देना।

दादी: टांगें खींचकर सीधी करो, और बच्चा मालिश में रोए तो अच्छा है, फेफड़े मज़बूत होते हैं। डॉक्टर: नवजात के हाथ-पैर का हल्का मुड़ा रहना गर्भ की स्थिति की वजह से सामान्य है और कुछ हफ्तों में अपने आप सीधा होता है; खींचने से कूल्हे के जोड़ को नुकसान हो सकता है, और रोना दर्द का संकेत है, कसरत नहीं। पर परंपरा का बड़ा हिस्सा बिल्कुल सही है — रोज़ का तय समय, त्वचा से त्वचा का स्पर्श, हल्के लंबे स्ट्रोक, पेट पर घड़ी की दिशा में गोल हाथ और सुबह की हल्की धूप। नियम याद रखिए: जो चीज़ शरीर के अंदर जा रही हो या जिसमें ज़ोर लग रहा हो, वो छोड़ दीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: मालिश किस उम्र से शुरू करें? — जन्म के कुछ दिन बाद, जब शिशु घर आ जाए और त्वचा सामान्य हो। नाभि का ठूंठ गिरने तक पेट का हिस्सा छोड़ दें; समय से पहले जन्मे शिशु के लिए डॉक्टर से पूछ लें।

सवाल: कितनी देर और कितनी बार मालिश करनी चाहिए? — रोज़ एक बार 10-15 मिनट काफी है, नवजात के लिए 5 मिनट से शुरू करें। दो बार करनी हो तो दूसरी बार शाम को सोने से पहले, और उतनी ही हल्की।

सवाल: क्या मालिश से बच्चा जल्दी बैठने-चलने लगता है? — नहीं, यह मांसपेशियों की परिपक्वता पर निर्भर करता है। मालिश आराम, नींद और जुड़ाव में मदद करती है; विकास के मील-पत्थर तय समय पर ही आते हैं।

सवाल: मालिश के तुरंत बाद नहलाना ज़रूरी है? — ज़रूरी नहीं, पर 10-15 मिनट बाद नहलाने से बचा तेल निकल जाता है और नींद अच्छी आती है। नहलाना हफ्ते में 2-3 बार पर्याप्त है।

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समीक्षा

  • Nakul PhatakCEO, theAsianparent India & Indonesia
    theAsianparent इंडिया के प्रमुख; एक बच्चे के पिता
  • Roshni ChuganiHead of Marketing, theAsianparent India & Singapore
    मां और शिशु क्षेत्र में 12 वर्षों का अनुभव; दो बच्चों की मां

प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम