
इस हफ़्ते फिर केंद्र की क़तार है — दूसरी टीका-मुलाक़ात. और घर लौटकर शायद वह आवाज़ भी, जिसके आगे दुनिया की हर आवाज़ फीकी है: पहली खिलखिलाती हँसी.
छह हफ़्ते वाली क़तार अब जानी-पहचानी है — वही केंद्र, वही कार्ड, बस बच्चा छह हफ़्ते बड़ा और सुइयों का पुराना खिलाड़ी. आज पेंटावैलेंट-2, OPV-2 और रोटा-2 का दिन है.
पिछली बार का सबक़ साथ है: जाते हुए पेट भरा, लौटते हुए छाती से लगा हुआ, और शाम की ड्यूटी बँटी हुई. टीकों का दूसरा दौर ज़्यादातर घरों में पहले से आसान बीतता है.
और इसी दौर की मीठी घटना — हँसी. मुस्कान तो पुरानी हो चुकी; अब गुदगुदी, अजीब आवाज़ या लुका-छिपी के जवाब में पेट से उठी खिलखिलाहट आती है. किसी घर में इस हफ़्ते, किसी में महीने भर बाद — पर आती ज़रूर है.
टीकों की दूसरी ख़ुराक पहली वाली सूची पर ही चलती है — हल्का बुख़ार-सूजन-चिड़चिड़ापन सामान्य, दवा सिर्फ़ बताई ख़ुराक, ठंडी पट्टी ठीक. रोटा की बूँदों के बाद थूकना/हल्की उल्टी हो जाए तो घबराइए मत — केंद्र पर बता दीजिए, ख़ुराक का हिसाब वे देखते हैं.
सिर की पकड़ अब भरोसे लायक़ हो रही है — सहारे से बिठाने पर सिर सीधा टिकता है, झूलता कम है. गोद-चाल बदलिए: अब बच्चा काँधे से लगकर दुनिया देखना चाहता है, पीठ के बल कम.
हँसी के साथ सामाजिक खेल शुरू — लुका-छिपी (चेहरा ढँककर 'कहाँ गए?'), गालों पर हवा की फूँक, उँगलियों की गुदगुदी. यह मनोरंजन भर नहीं है: बारी का इंतज़ार, अनुमान, हैरत — यही सब आगे की सोच के औज़ार हैं.
नज़र अब रंगों की दुनिया में है — चटख़ लाल-पीले की पहचान पक्की, और चीज़ों को आँखों से पकड़कर सिर घुमाकर पीछा करना रोज़ बेहतर. आवाज़ की दिशा में सिर घुमाने की शुरुआत भी इसी दौर की है.
तीन टीका-मुलाक़ातों (6-10-14) के बीच का यह दौर माँ की अपनी सेहत के लिए भी सही पड़ाव है: छह-सप्ताह की जाँच में कुछ बाक़ी रहा हो — हीमोग्लोबिन दोबारा, थायरॉइड, कमर-पेल्विक की तकलीफ़ — तो बच्चे के टीकों वाले दिन ही अपना काम भी निपटा लीजिए; केंद्र एक ही है.
दूध पिलाने वाली माँ का खाना अब भी 'दो लोगों की गुणवत्ता' माँगता है — मात्रा नहीं. दाल-दही-हरी सब्ज़ी-पानी की वही तिकड़ी+, और IFA जारी रखने की सलाह मिली हो तो गोली भी. माँ का एनीमिया दूध से नहीं, माँ से उसकी ताक़त छीनता है.
मन का मौसम अब खुला होना चाहिए — बच्चा हँसता है, रातें लंबी हुई हैं. फिर भी भारीपन टिका हो, चिड़चिड़ाहट बढ़ती हो, या बच्चे से जुड़ाव महसूस न होता हो — यह देर से आया पोस्टपार्टम डिप्रेशन भी हो सकता है; वह छह हफ़्तों की मियाद नहीं देखता. कहिए — डॉक्टर से, टेली-मानस (14416) से, किसी से भी. इलाज है.
टीकों की तीसरी तारीख़ (14 सप्ताह — पेंटा-3, OPV-3, fIPV-2, रोटा-3, PCV-2) लौटते हुए लिखवा लीजिए. तीन में से दो मुलाक़ातें हो चुकीं — आख़िरी वाली के बाद बड़ा अंतराल आता है (सीधे 9 महीने).
हँसी के खेल रोज़ की रस्म बनें — लुका-छिपी सबसे सस्ता और सबसे सिद्ध. भाई-बहन हों तो यह उनका विभाग बना दीजिए; बड़े बच्चे इस उम्र के सबसे अच्छे मनोरंजक हैं, और रिश्ता भी वहीं बनता है.
करवट की तैयारी शुरू — टमी टाइम में अब बच्चा वज़न एक बाँह पर लेकर झूलने-सा लगे तो समझिए पलटने (रोलिंग) की रिहर्सल चालू है. आज का नियम कल की चोट बचाता है: बिस्तर-सोफ़े पर अकेला एक पल नहीं — बदलने-पोंछने का हर काम अब एक हाथ बच्चे पर रखकर.
अपने फ़ोन की गैलरी से आगे एक काम — पहली हँसी की आवाज़ रिकॉर्ड कर लीजिए. यह सलाह विकास की नहीं है; बस जो घर यह करना भूल गए, वे बरसों पछताते हैं.
इस सप्ताह की ज़रूरी बातें एक जगह. आपके शिशु के हिसाब से डॉक्टर इनमें बदलाव बता सकते हैं.
| बात | दसवें सप्ताह में |
|---|---|
| तारीख़ | 10-सप्ताह के टीके — पेंटा-2, OPV-2, रोटा-2 |
| टीके के बाद | वही सूची — हल्का बुख़ार-सूजन सामान्य |
| मुमकिन तोहफ़ा | पहली खिलखिलाती हँसी |
| ताक़त | सिर की भरोसेमंद पकड़; काँधे से दुनिया-दर्शन |
| नया नियम | ऊँची सतह पर अकेला एक पल नहीं — रोलिंग की रिहर्सल |
| अगली तारीख़ | 14-सप्ताह के टीके — लिखवा लें |
| माँ | अपनी बाक़ी जाँचें उसी केंद्र-दिन निपटाएँ |
पक्की सूची — तीन महीने से छोटे का बुख़ार (टीकों के हल्के-छोटे बुख़ार के अलावा), दूध छोड़ना, तेज़ साँस, सुस्ती, झटके: उसी समय अस्पताल. टीकों के बाद की दुर्लभ सूची भी वही — तीन घंटे से लंबा चीख़ता रोना, बहुत तेज़ बुख़ार, झटके, ढीलापन: उसी समय.
गिरने की चोटें इसी दौर से शुरू होती हैं — पलंग से गिरा बच्चा हर अस्पताल की रोज़ की कहानी है. गिर जाए तो: होश-रोना सामान्य और तुरंत चुप हो जाए तो भी उस दिन नज़र रखिए; बेहोशी, उल्टियाँ, असामान्य सुस्ती, या सिर पर बढ़ता उभार — उसी समय अस्पताल.
यह लेख सिर्फ़ सामान्य जानकारी के लिए है. यह व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह की जगह नहीं ले सकता. आपके शिशु की सेहत, जन्म के हालात और जाँचों का पूरा हाल देखकर सलाह वही दे सकते हैं — आपके बाल-रोग विशेषज्ञ या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर.
उम्र, लिंग और वज़न या लंबाई डालें — विश्व स्वास्थ्य संगठन के चार्ट का पर्सेंटाइल मिलेगा. याद रहे: एक नाप नहीं, नापों की चाल मायने रखती है.
सवाल: हँसाने की हर कोशिश पर बच्चा सपाट देखता रहता है — कब हँसेगा? — खिलखिलाहट की खिड़की चौड़ी है — 2 से 4 महीने. मुस्कान और 'कू-गू' चल रहे हैं तो रास्ता सही है; हँसी अपने दिन आएगी. (और अक्सर उस चीज़ पर आएगी जिसकी आपने कोशिश ही नहीं की थी — छींक, कुत्ते की आवाज़, बर्तन की खनक.)
सवाल: रोटा की बूँदें पिलाते ही बच्चे ने आधी थूक दीं — दोबारा पिलाएँगे? — यह फ़ैसला केंद्र का है — बताइए, वे तय करेंगे (आमतौर पर दोबारा पूरी ख़ुराक नहीं दोहराई जाती). घर पर अपने हिसाब से कुछ नहीं करना.
सवाल: बच्चा अब रात में करवट-सा लेने लगता है — पीठ के बल का नियम कब तक? — सुलाना हमेशा पीठ के बल — साल भर यही नियम है. जो बच्चा ख़ुद पलटना सीख गया, उसे रात में बार-बार वापस पलटाने की ज़रूरत नहीं; नियम 'सुलाते समय की पोज़िशन' का है. पर वह दौर अभी आगे है — अभी तो बिस्तर ख़ाली और पीठ के बल, बस.
सवाल: मालिश वाली मौसी बच्चे की टाँगें 'सीधी करने' के लिए खिंचाई-पट्टी की बात करती हैं — करवाएँ? — नहीं. नवजात की मुड़ी-मुड़ी टाँगें गर्भ की पोज़िशन की याद हैं और अपने आप सीधी होती हैं; खिंचाई-पट्टी-'सुधार' के नुस्ख़े नुक़सान कर सकते हैं. मालिश हल्के हाथ की हो — जोड़ों के करतब उसमें शामिल नहीं.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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