
अब तक चीज़ें बच्चे तक आती थीं; इस हफ़्ते से बच्चा चीज़ों तक जाना शुरू करता है — लटकते खिलौने पर पहला बेतरतीब वार इरादे की पहली चिट्ठी है.
प्ले-जिम के नीचे लेटा बच्चा लटकते झुनझुने को देर तक घूरता है — और फिर एक दिन बाँह उठाकर वार कर देता है. निशाना चूक जाता है, अगला भी. पर वह वार इस पूरे महीने की सबसे बड़ी ख़बर है.
क्योंकि वह इरादा है — 'मैं उस चीज़ को छूना चाहता हूँ और मेरा हाथ मेरे कहने पर चलेगा.' आँख नापती है, दिमाग़ हुक्म देता है, बाँह चलती है. तालमेल कच्चा है; हफ़्तों के अभ्यास में पक्का होगा, और पकड़ बनेगा.
दूसरी चुपचाप वाली ख़बर दिनचर्या की है — खाने-जागने-सोने का एक ढीला-ढाला क्रम अब अपने आप उभरने लगता है. उसे पकड़िए, थोपिए मत.
आँख-हाथ का तालमेल: लटकती चीज़ों पर वार अब रोज़ का खेल है — और हर चूकता वार भी अभ्यास है. हथेली में दिया झुनझुना अब कई पल थमता है, कभी-कभी सीधे मुँह की यात्रा पर निकलता है — मुँह इस उम्र की प्रयोगशाला है, इसलिए खिलौने धुले और बड़े (गले में न अटकने वाले) हों.
आवाज़ों में नए सुर — किलकारी की पहली झलक, ख़ुशी की ऊँची 'ई', और कभी-कभी हैरान करने वाली चीख़ (यह भी खेल है, आवाज़ की जाँच). रोने के सुर भी अब अलग-अलग पढ़े जा सकते हैं — भूख का रोना, थकान का, ऊब का.
दिनचर्या की शक्ल: जागने की खिड़कियाँ अब 60-90 मिनट की हैं — उससे लंबी जागी तो चिड़चिड़ाहट. 'खाना-खेलना-सोना' का ढीला क्रम कई घरों में अपने आप बैठ जाता है. घड़ी से नहीं, बच्चे के इशारों (आँखें मलना, जम्हाई, नज़र फेरना) से चलिए.
वज़न की चाल वही — और अब उसे नापने का सही औज़ार ऊपर है: महीने की तौल ग्रोथ-कैलकुलेटर में डालिए, पर्सेंटाइल की चाल देखिए, MCP कार्ड पर दर्ज रखिए.
तीन महीने की छुट्टी वाली माँओं के लिए वापसी अब दिखने लगी है — और उसकी तैयारी भावनाओं समेत होती है. पहला सच: काम पर लौटना बच्चे से प्यार का घटना नहीं है. दूसरा: दूध जारी रखना मुमकिन है — दफ़्तर में पम्पिंग का इंतज़ाम (जगह, फ़्रिज, ब्रेक) HR से अभी पूछ लीजिए; कई दफ़्तरों में माँगे बिना नहीं मिलता.
सँभालने वाले का फ़ैसला — दादी-नानी, सहायिका, क्रेच — जो भी हो, उसकी 'ट्रेनिंग' इन्हीं हफ़्तों में: सोने की पोज़िशन (पीठ के बल, ख़ाली बिस्तर), घुट्टी-पानी-शहद की सख़्त मनाही, झँझोड़ने की चेतावनी, और आपका फ़ोन-नंबर दीवार पर. लिखा हुआ एक पन्ना ज़बानी हिदायतों से बेहतर याद रहता है.
अपनी नींद का हिसाब भी ईमानदारी से — रात की खेप लंबी हुई है तो सोने का समय आगे मत खिसकाइए; वह घंटा फ़ोन नहीं, नींद माँगता है. थकान महीनों की है; क़िस्तों में ही उतरती है.
प्ले-जिम/लटकते खिलौने अब रोज़ के औज़ार — न हो तो जुगाड़ ज़िंदाबाद: मज़बूत डोरी पर चटख़ कपड़े का फूल/हल्का झुनझुना, पहुँच में, निगरानी में. वार करने की चीज़ भर चाहिए.
'खाना-खेलना-सोना' के ढीले क्रम को दिन में आज़माइए — खाकर खेलना, थककर सोना. सोते-सोते दूध की आदत (फ़ीड-टू-स्लीप) अभी समस्या नहीं है, पर क्रम की यह आदत आगे की नींद आसान करती है.
10-सप्ताह के टीके इसी/अगले हफ़्ते — तारीख़ निकालिए, जाइए, कार्ड पर चढ़वाइए. टीकों वाली शाम की ड्यूटी-बाँट अब घर की रिहर्सल की हुई व्यवस्था है.
मालिश-नहलाने की रस्म को 'बातचीत का समय' बनाए रखिए — अंग छूते हुए नाम बोलिए (हाथ, पैर, पेट), गिनती गाइए. यही रोज़ की भाषा-कक्षा है, और मालिश वाली मौसी आएँ तो भी बोलने का काम आपका है.
इस सप्ताह की ज़रूरी बातें एक जगह. आपके शिशु के हिसाब से डॉक्टर इनमें बदलाव बता सकते हैं.
| बात | नौवें सप्ताह में |
|---|---|
| मुख्य घटना | लटकती चीज़ों पर इरादे वाला वार |
| हाथ | झुनझुना पलों तक थमता; मुँह = प्रयोगशाला |
| आवाज़ें | किलकारी की झलक, ख़ुशी की 'ई', खेल वाली चीख़ |
| दिनचर्या | जागने की खिड़की 60-90 मिनट; खाना-खेलना-सोना |
| इसी दौर में | 10-सप्ताह के टीके (पेंटा-2, OPV-2, रोटा-2) |
| माँ | काम-वापसी की तैयारी: पम्पिंग + सँभालने वाले की ट्रेनिंग |
| खिलौने की कसौटी | धुला, बड़ा (गले में न अटके), पहुँच में |
पक्की सूची — तीन महीने से छोटे का बुख़ार, दूध छोड़ना, तेज़ साँस, सुस्ती, झटके: उसी समय अस्पताल (108).
खिलौनों के दौर की नई पंक्ति: पाँच सेंटीमीटर से छोटी कोई भी चीज़ (सिक्का, बटन, गुब्बारे का टुकड़ा) बच्चे की पहुँच की दुनिया से बाहर रहे — मुँह की प्रयोगशाला यही एक चीज़ माफ़ नहीं करती. और झूलों-पालनों की डोरियाँ/लटकनें इतनी छोटी हों कि गले तक कभी न पहुँचें.
यह लेख सिर्फ़ सामान्य जानकारी के लिए है. यह व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह की जगह नहीं ले सकता. आपके शिशु की सेहत, जन्म के हालात और जाँचों का पूरा हाल देखकर सलाह वही दे सकते हैं — आपके बाल-रोग विशेषज्ञ या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर.
उम्र, लिंग और वज़न या लंबाई डालें — विश्व स्वास्थ्य संगठन के चार्ट का पर्सेंटाइल मिलेगा. याद रहे: एक नाप नहीं, नापों की चाल मायने रखती है.
सवाल: वार करता है पर पकड़ नहीं पाता — कमज़ोरी? — नहीं, क्रम यही है: पहले घूरना, फिर वार, फिर छूना, फिर पकड़ (3-4 महीने). हर चूकता वार निशाने की पढ़ाई है — 'मदद' करके खिलौना हाथ में मत थमाइए, पहुँच में रखिए बस.
सवाल: दिनचर्या की कोशिश में घड़ी से चलूँ या बच्चे से? — बच्चे से — इस उम्र की 'दिनचर्या' क्रम है, टाइम-टेबल नहीं. घड़ी वाली सख़्ती (हर तीन घंटे पर ही दूध, तय मिनट पर नींद) अभी दोनों को रुलाती है. क्रम पकड़िए; घड़ी महीनों बाद ख़ुद बैठ जाती है.
सवाल: किलकारी-चीख़ें बहुत तेज़ हैं — रोकूँ? — बिल्कुल नहीं — यह आवाज़ की खोज है, और मज़ेदार दौर है. जवाब में आप धीमे बोलिए; बच्चा आवाज़ का ऊँच-नीच वहीं से सीखता है. मेहमानों को बता दीजिए — बच्चा ख़ुश है, दुखी नहीं.
सवाल: तीन महीने से पहले बाहर का लंबा सफ़र (मायके/गाँव) — ठीक है? — टीकों की तारीख़ों के बीच का हफ़्ता चुनिए, रास्ते का इंतज़ाम (छाया, दूध की सुविधा, साफ़ जगह) देखिए, और पहुँचकर पास के स्वास्थ्य-केंद्र का पता जान लीजिए. सफ़र अपने आप में मना नहीं — भीड़ और बीमार मिलने वालों से दूरी वाला नियम साथ चलता है.
प्रकाशक: theAsianparent संपादकीय टीम
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